‘सिर्फ घर ही नहीं, अपनी संस्कृति भी खोई’, अमेरिका में कश्मीरी हिंदू समूहों ने फिर से उठाई न्याय की मांग

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Kashmiri Hindu group: अमेरिका में कश्मीरी हिंदू एडवोकेसी ग्रुप्स ने 19 जनवरी का दिन पलायन दिवस के रूप में मनाया. साथ ही उन्‍होंने समुदाय के लिए न्याय, बहाली और सुरक्षित पुनर्वास की मांग दोहराई. कश्मीर हिंदू फाउंडेशन और पनुन कश्मीर ने इस तारीख को कश्मीर घाटी से कश्मीरी हिंदुओं के व्यवस्थित विस्थापन की याद दिलाने वाला बताया.

समूह ने कहा कि 19 जनवरी एक “जानबूझकर और लगातार जारी जातीय सफाए” की प्रक्रिया का प्रतीक है, जिसने एक मूल समुदाय को उसकी जड़ों से उखाड़ दिया. उन्होंने कहा कि कश्मीरी हिंदुओं ने सिर्फ अपने घर ही नहीं खोए, बल्कि अपनी जड़ें और सांस्कृतिक पहचान भी खो दी. उन्होंने प्रतीकात्मक हाव-भाव, चुनिंदा भूलने की आदत और पर्यटन पर फोकस वाली कहानियों को अपर्याप्त जवाब बताकर खारिज कर दिया.

नरसंहार कोई एक घटना नहीं…

लेखिका, राजनीतिक कमेंटेटर और जोनराजा इंस्टीट्यूट ऑफ जेनोसाइड एंड एट्रोसिटीज स्टडीज की चेयरपर्सन सुनंदा वशिष्ठ ने कहा कि इन अपराधों को एक अकेली ऐतिहासिक घटना के तौर पर नहीं देखा जा सकता. उन्होंने कहा कि “नरसंहार कोई एक घटना नहीं होता. यह एक लंबी प्रक्रिया होती है, जिसका उद्देश्य किसी खास पहचान वाले समूह को खत्म करना या बहुत कमजोर कर देना होता है. ऐसे समूहों को अपराधी अपने वर्चस्व या पहचान के लिए खतरा मानते हैं.”

मार्गदर्शक प्रस्‍ताव अपनाएं भारत

वहीं, पनुन कश्मीर के संयोजक डॉ. अग्निशेखर ने कहा कि विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं की वापसी और पुनर्वास तभी संभव है जब भारत सरकार मार्गदर्शक प्रस्ताव को अपनाए. उन्होंने कहा कि कोई भी वैकल्पिक तरीका इस मुद्दे के राजनीतिक, सुरक्षा और सभ्यतागत पहलुओं को हल करने में नाकाम रहा.

कश्‍मीरियत की अवधारणा खारिज

पनुन कश्‍मीर यूथ विंग की ओर से बोलते हुए नितिन धर ने “कश्मीरियत” की अवधारणा को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि कश्मीर में ऐतिहासिक रूप से “कश्मीर देशाचार” का पालन होता था, जो एक अलग सभ्यता और सांस्कृतिक पहचान थी, जिसे बाद में नष्ट कर दिया गया. उन्होंने कहा कि मनगढ़ंत कहानियां ऐतिहासिक सच्चाई की जगह नहीं ले सकतीं.

कश्मीर हिंदू फाउंडेशन के संस्थापक दीपक गंजू ने मांग की है कि 1989 के बाद विस्थापित कश्मीरी पंडितों द्वारा बेची गई सभी चल और अचल संपत्तियों को आधिकारिक तौर पर “डिस्ट्रेस सेल” घोषित किया जाए. उन्होंने कहा कि ऐसे लेन-देन रद्द कर दिए जाने चाहिए और जमीन के रिकॉर्ड के अनुसार असली मालिकों को उनका कब्जा वापस दिया जाना चाहिए.

केएचएफ के अध्यक्ष अनित मोंगा ने भी खाली पड़ी संपत्ति पर कब्ज़ा करने या अतिक्रमण करने पर पूरी तरह से रोक लगाने की मांग की. ग्रुप्स ने कहा कि न्याय, मुआवजा और सुरक्षित पुनर्वास संवैधानिक और नैतिक जरूरतें हैं. उन्होंने भारत, सिविल सोसायटी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे नरसंहार को मान्यता दें और कश्मीरी हिंदुओं की गरिमापूर्ण वापसी सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक कदम उठाएं.

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