Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, प्रत्येक वस्तु परमात्मा को अर्पित करो और फिर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करो। “प्रसादस्तु प्रसन्नता “प्रसाद का फल प्रसन्नता है। हर वस्तु या परिस्थिति हमारे लिए सुखद नहीं हो सकती है, कई वस्तु दु:खदाई भी होती है। लेकिन प्रत्येक वस्तु और परिस्थिति को परमात्मा का प्रसाद मान कर ग्रहण करेंगे तो जीवन प्रसन्नता से परिपूर्ण रहेगा।
भक्तों का सिद्धान्त है- “असमर्पित वस्तुनां त्याग:” जो वस्तु परमात्मा को समर्पित नहीं हुई है उसे भक्त ग्रहण नहीं करते हैं। श्रीमद्भागवद्गीता में भगवान स्वयं कहते हैं- “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।
हे अर्जुन ! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर। साधु संतों में एक कहावत है-“धोकर पियो, दिखाकर खाओ। सीधे बैकुण्ठ जाओ। धोकर पीना – इसका आशय भगवान के चरणामृत से है, दिखाकर खाना इसका आशय भगवान के प्रसाद से है। अगर भगवान का चरणामृत और भगवान का प्रसाद नित्य ही कोई ग्रहण करता है तो उसके कल्याण में कोई संदेह नहीं है।
प्राचीन भारत में हम सबके पूर्वज दैनिक पूजा-पाठ के बाद नित्य मंदिर जाकर तुलसी चरणामृत लेते थे और घर पर जो कुछ प्रसाद तैयार होता, वह पहले भगवान को धराया जाता और फिर वह भगवान का प्रसाद ही ग्रहण करते थे। हम सबको भी उनका अनुकरण करना चाहिए।
हम जिसका उपयोग करते हैं, जिसके आधार पर जीवित रहते हैं, वह सब परमात्मा का है। प्रभु जिस परिस्थिति में रखें, उसी में संतोष मानोगे तो ही सुखी हो सकोगे। प्रभु की इच्छा में अपनी इच्छा मिला देंगे तो भक्ति बाढ़ के पानी की तरह बढ़ेगी।
सुख को प्रभु की कृपा समझने वाला तो साधारण वैष्णव है। अनुकूलता हो या प्रतिकूलता दोनों में ईश्वर का उपकार ही मानो। प्रभु के द्वारा दी गई प्रत्येक परिस्थिति को स्वीकार न करना, प्रभु के प्रति नाराजगी प्रकट करना है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।