Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, श्री गणेश का वास्तविक अर्थ क्या है? इस पर भी विचार करना आवश्यक है। गण का अर्थ है – वर्ग, समूह, समुदाय। ईश का अर्थ है स्वामी। शिवगणों के स्वामी हैं इसलिए गणेश।दूसरा भाव गण अर्थात् देवों के स्वामी, समस्त देवों के स्वामी होने से प्रभु को गणेश कहते हैं। तीसरा भाव गण अर्थात् जीव।गणानां जीवानां समूहः जीव मात्र के स्वामी है इसलिए गणेश। आठ बसु, ग्यारह रुद्र, द्वादश आदित्य, और दो अश्विनीकुमार यह तैंतीस कोटि देवता कहलाते हैं। समस्त देवताओं के स्वामी है इसलिए गणेश नाम प्रसिद्ध हुआ। श्री गणेश जी की उपासना करने से समस्त देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
जापर कृपा श्री गणेश की होई।
तापर कृपा करें सब कोई।।
गण शब्द व्याकरण के अन्तर्गत भी आता है। अनेक शब्द एक गण में आते हैं। व्याकरण में गणपाठ का अपना एक अलग ही अस्तित्व है।संख्या विशेष वाली सेना भी गण बोधक शब्द है गज सत्ताइस, रथ सत्ताइस,अश्व इक्यासी,पदाति एक सौ पैंतीस अर्थात् दो सौ सत्तर का समुदाय इसके स्वामी श्री गणेश जी हैं।
ज्योतिष शास्त्र में अश्वनी आदि जन्म नक्षत्रों के अनुसार देव, मानव और राक्षस, ये तीन गण हैं। इन सब प्रकार के गणों के ईश श्री गणेश जी हैं। छन्द शास्त्र में भी मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण और तगण ये आठ गण होते हैं। इनके अधिष्ठात्रि देवता होने के कारण भी इन्हें श्री गणेश जी की संज्ञा दी गई है। गण नाम दैत्य पर अधिकार पाने के कारण भी ये गणेश कहे जाते हैं।अक्षरों को गण कहा जाता है। उनके ईश होने के कारण इन्हें गणेश कहा जाता है। इसलिए ये विद्या बुद्धि के प्रदाता कहे जाते हैं।
ज्ञानार्थवाचको गश्च णश्च निर्वाणवाचकः।
तयोरीशं परब्रह्म गणेशं प्रणमाम्यहम्।।
विद्वानों ने ‘ ग ,अक्षर ज्ञान का और ‘ ण , अक्षर निर्वाण का वाचक है। ज्ञान और निर्वाण के ईश परब्रह्म श्री गणेश जी को प्रणाम करता हूं। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।