Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, धर्मशास्त्रों में कर्म तीन प्रकार के बताये गये हैं। तीनों प्रकार के कर्मों से जब जीव को छुटकारा मिल जाता है तो वह मुक्त हो जाता है। मुक्त होने का अर्थ है, भगवत् चरणों की प्राप्ति, आवागमन के चक्कर से छुटकारा और मानव जीवन की सफलता।
क्रियमाण कर्म कहते हैं जो वर्तमान में हम कर रहे हैं। संचित कर्म कहते हैं जो पहले हम कर चुके हैं और प्रारब्ध कर्म उसे कहते हैं जो हमारे कर्म फल देना शुरू कर दिए हैं, जिन हमारे कर्मों का फल आज हमको मिल रहा है उसी को प्रारब्ध कर्म और भाग्य भी कहते हैं। इस संसार में कोई किसी को सुख अथवा दुःख नहीं दे रहा है। उसके अच्छे बुरे कर्म ही उसे सुख और दुःख प्रदान कर रहे हैं। श्री रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में निषादराज को उपदेश देते हुए श्री लक्ष्मण जी कहते हैं-