कुतप काल में श्राद्ध करने से पितरों को प्राप्त होती है विशेष तृप्ति: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Must Read
Shivam
Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, आश्विनमास का पितृपक्ष,ये पितरों का महापर्व चल रहा है। इस काल में लोग पितरों की संतुष्टि के लिये पिण्डदानादि,श्राद्धादि कर्म करते हैं। वेद का वचन है- देव पितृ कार्याभ्यां मा प्रमदितव्यं।’
देवता और पितरों के कार्य में प्रमाद नहीं करना चाहिए। देवताओं के कार्य में थोड़ा प्रमाद हो जाए तो चलेगा, होना नहीं चाहिए, परन्तु चलेगा। लेकिन पितरों के कार्य में व्यक्ति प्रमाद करे नहीं चलेगा। क्यों पितृ असंतुष्ट हो जाते हैं और पितरों के असंतुष्ट होने पर बड़ी-बड़ी आपत्तियां और विपत्तियां जीवन में आती है।
 पितरों के असंतुष्ट होने से परिवार में वैमनश्य उत्पन्न हो जाता है, पितरों के असंतुष्ट होने से परिवार की वृद्धि बाधित हो जाती है। पितरों के असंतुष्ट होने से अनेक प्रकार के उपद्रव खड़े हो जाते हैं। कारण पितर अपेक्षा रखते हैं कि अवसर आने पर ये हमारे लिये जलदान पिण्डदान प्रदान करें,अनेक प्रकार के कार्य सम्पादित करें।
अगर पितरों के लिए श्राद्ध न किया जाए तो- ‘ श्राद्धं न कुरुते मोहाद् रक्तं तस्य पिवन्ति ते।’  तो पितर लोग उसको दण्ड देते हैं। ‘ रक्तं तस्य पिवन्ति ते।’  ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर देंगे कि आपका खून जलने लगेगा। लोग कहते हैं हमारा खून जल रहा है या खौल रहा है। पितर दिखाई नहीं पड़ते, परन्तु पर्व आने पर पितर ये आकांक्षा करते हैं। इस प्रसन्नता से आते हैं कि मेरे वंश में उत्पन्न लोग मेरे लिए कुछ करेंगे। 
जब वो आ करके इस प्रतीक्षा में रहते हैं और उस समय वंश के लोग पितरों के लिए श्राद्धादि कर्म नहीं करते तब – ‘ पितरस्य तस्य शापं दत्वा प्रयान्ति।’ तब पितर उसे शाप देकर जाते हैं। क्रोधित होकर जाते हैं। इसलिए पितरों के लिएद श्राद्धादि कर्म जो विहित है उसे भगवान की आज्ञा,आज्ञा कैंकर्य मान करके करना चाहिए।
यद्यपि भक्ति के सिद्धान्त में भगवान की उपासना को छोड़कर किसी अन्य उपासना विहित नहीं है। परन्तु भगवान की आज्ञा मानकर, इसे आज्ञा कैंकर्य मानकर वैष्णव भी नित्य नियम से पितरों का तर्पण,श्राद्धादि कर्म सम्पादित करते हैं। ‘ आज्ञा अनुज्ञा विभागेन द्विधा शास्त्रीय पद्धति।’ आज्ञा कैंकर्य और अनुज्ञा कैंकर्य।आज्ञा कैंकर्य क्या है? वैष्णव सिद्धांत में भगवान का कैंकर्य ही परम विलक्षण मोक्ष है। 
अलग से कोई मोक्ष हमको मिलेगा, शास्त्र में सब वर्णन है। परन्तु आचार्य कहते हैं, भगवान के कैंकर्य में हमारी रुचि दृढं हो जाए। भगवान के कैंकर्य को करके, भगवान के उसे कैकर्य से भगवान को प्रसन्नता हो और भगवान की वह प्रसन्नता देखकर,भक्त प्रसन्न हों यह वैष्णव धर्म है। भगवान का कैंकर्य क्या है? आज्ञा-अनुज्ञा दो प्रकार के कैंकर्य हैं।
भगवान ने शास्त्र में जो आज्ञा दी है उन आज्ञाओं को पालन करना, ये भगवान का आज्ञा कैंकर्य है।आज्ञा कैंकर्य है- ‘ सत्यं वद धर्मं चर ‘ ये जितने वेद के वचन हैं जो नित्य कर्म हैं, उन नित्यकर्म और नैमेतिक कर्मों को भगवान की आज्ञा मान करके कर्म करना ये भगवान का आज्ञा कैंकर्य है। पितरों के निमित्त श्राद्धादि करने के बाद भी भावना यही की जाती है। ‘ अनेन श्राद्धेन पितृरूपी जनार्दनः प्रियं तां न मम।’ पितृ रूपी जनार्दन भगवान ही श्राद्धकर्म द्वारा, भगवान की आराधना की जाती है।
 जो श्राद्ध का अनुमोदन करता है, जो श्राद्ध  करने की प्रेरणा देता है, और जो श्राद्ध कर्म करता है उन सबको समान पुण्य की प्राप्ति होती है। अगर हम श्राद्ध न कर सके लेकिन लोगों को श्राद्ध की प्रेरणा देते हैं तब भी हमें पुण्य की प्राप्ति होती है। श्राद्ध के विषय में  नियम है,  अगर कुछ भी न हो आपके पास साधन फिर भी जो कुछ भी मिल जाय, फल फूल उसी से श्राद्ध कर लो। अगर कुछ नहीं है तो शाक से श्राद्ध कर लो, शाक भाजी जो है उसे समर्पित माने।
श्राद्ध  के लिए सबसे श्रेष्ठ समय कुतप काल दिन में 11:26 से 12: 25 तक होता है। कुतप काल में श्राद्ध करने से पितरों को विशेष तृप्ति प्राप्त होती है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
Latest News

युजवेंद्र चहल ने अचानक किया सन्यास लेने का ऐलान? जानें स्पिनर ने किस श्रेणी के क्रिकेट को कहा अलविदा!

New Delhi: भारतीय क्रिकेट टीम के लेग स्पिनर युजवेंद्र चहल ने शुक्रवार को प्रथम श्रेणी क्रिकेट से संन्यास का...

More Articles Like This