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Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, हमें निज धर्म पर चलना सिखाती रोज रामायण। सदा शुभ आचरण करना बताती रोज रामायण।।श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीसीतारामजी की कथा तो है ही, लेकिन इस कथा के माध्यम से हम आपके जीवन की सम्पूर्ण शिक्षा है। रात्रि शयन से लेकर सुबह जगने का क्या नियम है, पूरे दिन की हमारी चर्या कैसी होनी चाहिए, क्या विधि है और क्या निषेध है, क्या जीवन में करना अनिवार्य है और क्या नहीं करना है, इसका वर्णन विविध उदाहरणों के साथ सुनने को मिलता है। इसीलिए कहते हैं श्रीराम कथा हम सबका सम्पूर्ण जीवन है।
श्री रामायण जी को संतों ने दर्पण कहा है। जब हम दर्पण के सामने खड़े होते हैं तो हमें अपना स्वरूप देखने को मिलता है। श्रीरामायण जी हम पढ़ते-सुनते हैं तो हमें पता लगता है कि हमारा जीवन कैसा है, और इसमें क्या क्या सुधार की आवश्यकता है। जो नित्य रामायण पढ़ते हैं और जागरूक हो करके जीवन की कमियों को दूर करते हैं, उनका जीवन महान बन जाता है।
रामायण सुरतरु की छाया।
दुःख भये दूर निकट जो आया।।
श्री रामायण जी को संतों कल्पवृक्ष कहा है। जैसे कल्प वृक्ष की छाया में सभी मनोकामनायें पूरी होती है, वैसे जो रामायण श्रद्धा से पढ़ते हैं उनका लोक और परलोक दोनों सुंदर हो जाता है। उनकी समस्त शुभ मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।श्रीरामायण जी को संतों ने भगवान का निवास स्थान बताया है। भगवान श्रीराम सपरिकर श्रीरामायण जी में निवास करते हैं। श्री रामायण जी को प्रणाम करने से भगवान श्री सीताराम जी को प्रणाम करने का फल मिलता है।
श्रीरामायण जी में और भगवान श्रीसीताराम जी में रंचमात्र अंतर नहीं है। श्री रामायण जी भगवान के ही स्वरुप है। संतों श्री रामायण जी को भगवान के पास पहुंचने का मार्ग बताया है। जिन्हें भगवान श्रीसीताराम जी के चरणों को प्राप्त करना है उन्हें श्री रामायण जी का आश्रय अवश्य लेना चाहिए। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।