पितरों के प्रति श्रद्धा और शास्त्रों में विश्वास से जीवन में मिलता है कल्याण का मार्ग: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, पितरों के असंतोष से बड़ी-बड़ी आपत्तियां और विपत्तियां जीवन में आती हैं। पितरों के असंतोष से परिवार में बड़ा-बड़ा वैमनश्य उत्पन्न हो जाता है। पितरों के असंतोष से वंश की वृद्धि बाधित हो जाती है। अनेक प्रकार के उपद्रव खड़े हो जाते हैं। करण पितर हमसे अपेक्षा रखते हैं कि अवसर आने पर यह मेरा पूजन करे और मेरे लिए जलदान,पिण्डदान आदि कर्म सम्पादित करे।
जिसे हम सब श्राद्ध कहते हैं।श्राद्ध शब्द  का अर्थ है-‘ श्रद्धार्थं इदं श्राद्धं ‘ पितरों के लिए श्रद्धा व्यक्त करने का जो हम कर्म करते हैं, उसी का नाम श्राद्ध है। दूसरा अर्थ यह भी है- ‘श्रद्धया कृतं सम्पादितं तत श्राद्धं’ श्रद्धा पूर्वक पितरों के लिए शास्त्र विधि से जिस कार्य का हमने सम्पादन किया उसका नाम श्राद्ध है।श्रद्धा क्या है? श्रद्धा किसे कहते हैं?
वेद गुरु वाक्येशु विश्वासः श्रद्धा। श्रद्धा का ये लक्षण है। मनमुखी श्रद्धा का कोई मूल्य नहीं होता, सिद्धान्त विहीन श्रद्धा किसी काम की नहीं होती, वो पतन का कारण बनती है। श्रद्धा की परिभाषा तय की आचार्यों ने, श्रद्धा किसे कहते हैं?” वेद गुरु वाक्येशु विश्वासः श्रद्धा।” वेद अर्थात शास्त्र, वेद से लेकर पुराण पर्यन्त जितने शास्त्र हैं,आर्ष ग्रन्थ हैं रामायण, गीता, भागवत इत्यादि।
 यहां पर वेद उपलक्ष्ण है शास्त्र का, वेद अर्थात् शास्त्र। और गुरु अर्थात् गुरु, सन्त, ज्ञानीजन उनके वाक्य में, उनके वचनों में हमारा विश्वास हो, इसी का नाम श्रद्धा है। भगवान में आपकी बड़ी श्रद्धा है लेकिन शास्त्र के वचनों में विश्वास नहीं है, गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, संतों की वाणियों में विश्वास नहीं है, इसका मतलब आपकी श्रद्धा मनमुखी है। ऐसी श्रद्धा कल्याणकारिणी नहीं होती। ‘वेद गुरु वाक्येषु विश्वासः। ‘
वेद और गुरु के वाक्य में दृढ़ विश्वास हो। इसी का नाम श्रद्धा है। पहले अपने भीतर ये तय करो, शास्त्र की बात को आंख बन्द करके मानो। प्रत्यक्ष दिखने वाला सूर्य झूठा हो सकता है, प्रत्यक्ष दिखने वाला चन्द्रमा भी झूठा हो सकता है लेकिन शास्त्र का कोई वचन मिथ्या नहीं हो सकता। तभी कोई भी मार्ग हो भक्तिमार्ग,ज्ञानमार्ग,कर्ममार्ग, योगमार्ग। सभी मार्गों में जब तक शास्त्र में विश्वास नहीं होगा, तब तक सफलता प्राप्त नहीं होगी। गीताचार्य भगवान् श्री कृष्ण ने तो स्वयं कहा है कि- यः शास्त्र विधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिं।।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य- जो शास्त्र विधि को छोड़कर, वर्तते कामकारतः – अपने मन से, जो मन में आवे वही करता है।न स सिद्धिमवाप्नोति – उसे किसी भी क्षेत्र में सिद्धि नहीं मिलती। न सुखं – न उसे सुख मिलता है। न परां गतिं – उसे मरने के बाद उत्तम गति भी नहीं मिलती। तो क्या करें? भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – ‘तस्मात शास्त्रं प्रमाणं ते – इसलिए शास्त्र ही परम प्रमाण है। उसमें विश्वास रखो। ‘कार्याकार्य व्यवस्थितौ।’ क्या कार्य है? क्या कार्य है? इसमें शास्त्र ही प्रमाण है। वेद वाक्य, शास्त्र वाक्य, संतों की वाणी ही प्रमाण है।
जैसा अपने यहां कुल परम्परा में चला आ रहा है, वैसा ही पितरों के लिए पितृपक्ष के अवसर पर- धर्म-कर्म, दान-पुण्य करना चाहिए। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।

More Articles Like This

Exit mobile version