नवधा भक्ति के नौ सूत्रों से जीवन होगा सफल- दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, अरण्यकाण्ड में मां शबरी को माध्यम बनाकर प्रभु श्री राम नवधा भक्ति का उपदेश करते हैं। नवधा भक्ति भगवान को पाने के ये नव रास्ते हैं। इसमें से कोई भक्ति अगर जीवन में बन जाये तो प्रभु की प्राप्ति हो सकती है। प्रथम भक्ति संतों का संग, दूसरी भक्ति भगवान की कथा में प्रेम, गुरु महाराज की सेवा बिल्कुल अमान होकर तीसरी भक्ति बताया।
चौथी भक्ति छल कपट का त्याग करके भगवान का गुणगान करना, पांचवी भक्ति दृढ़ विश्वास के साथ मंत्र जप। छठवीं भक्ति धीरे-धीरे संसार से मन को हटाकर भगवान में लगाना। सबमें भगवान का दर्शन करना संतो के प्रति बहुत सम्मान का भाव रखना सातवीं भक्ति बताया।आठवीं भक्ति यथा लाभ संतोष, जो कुछ अपने परिश्रम से ईश्वर की कृपा से प्राप्त हो उसमें संतोष रखना और किसी में दोष दर्शन न करना और नवमी भक्ति सरल जीवन, छल कपट से रहित जीवन और भगवान पर भरोसा।
किष्किन्धाकाण्ड के प्रारम्भ में प्रभु श्री राम जी का श्री हनुमान जी से मिलन होता है। महाराज सुग्रीव की प्रभु से मित्रता, बाली का उद्धार, भगवती सीता की खोज के लिए बड़े-बड़े योद्धा चारों दिशा में जाते हैं। दक्षिण दिशा में जो लोग जा रहे हैं उनमें अंगद, नल-नील जामवंत जी महाराज श्री हनुमान जी महाराज आदि वरिष्ठ लोग हैं।
सम्पाती के द्वारा यह बताया जाना कि भगवती सीता लंका अशोक वाटिका में हैं जो सौ योजन समुद्र को पार करेगा वही भगवती सीता का पता लगा पायेगा। उसी के द्वारा राम कार्य सम्पन्न होगा। सबने अपनी-अपनी शक्ति के विषय में बताया लेकिन समुद्र पार होने में सबने संदेह व्यक्त किया। आध्यात्मिक दृष्टि से समुद्र  देहाभिमान का प्रतीक है, देहाभिमान को पार करना देहाभिमनियों से सम्भव नहीं है।
हनुमान का अर्थ होता है जिसने अपने मान का हनन किया है जो अभिमान शून्य है वही देहाभिमान को पार कर सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से सीता अर्थात् भक्ति। भक्ति को वही प्राप्त कर सकता है। इसलिए श्री हनुमान जी ही भगवती सीता का पता लगाने में सफल होते हैं। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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