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The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, उत्सव प्रसाद में तन्मय होने के लिए नहीं, प्रभु में तन्मय होने के लिए है। जब भारत पर विदेशी आक्रांताओं का शासन था, उस काल में धर्म पर बहुत बड़ा संकट था। भारत के बड़े-बड़े वीर सपूत विदेशी आक्रांताओं के अत्याचार का विरोध कर रहे थे, बड़ी-बड़ी लड़ाईयां हो रही थी।
समाज का सभी वर्ग उस संकट से मुक्ति पाने के प्रयास में लगा था। महाराष्ट्र में पूरे भारतवर्ष के संतों का सम्मेलन हुआ, उस सम्मेलन का नेतृत्व छत्रपति शिवाजी के गुरुदेव समर्थ गुरु श्रीरामदासजी महाराज ने किया था। समर्थ गुरु ने संतों के बीच में कहा कि जो भयानक समय चल रहा है, इसमें सब लोग अपना अपना योगदान दे रहे हैं। हम संतों का कार्य है कि- भारत और भारतीयता के प्रति लोगों का श्रेष्ठ भाव बना रहे, ऐसा प्रयास करें।
उस काल के सभी समर्थ संतों ने सनातन धर्म का प्रचार करने के लिए अपने-अपने साधन बताए। किसी ने कहा हम गांव-गांव में जाकर यज्ञ करेंगे, यज्ञ के माध्यम से सनातन धर्म का प्रचार प्रसार करेंगे। किसी ने सत्संग वाली बात कही कि- हम सत्संग के माध्यम से यह पुण्य कार्य करेंगे। आखरी में समर्थ गुरु ने कहा कि- हम पूरे भारतवर्ष में उत्सव के माध्यम से सनातन धर्म को और धर्मावलम्बियों को जागृत करेंगे।
इस प्रसंग से हम सबको शिक्षा लेना चाहिए कि भारतवर्ष के जितने उत्सव महोत्सव हैं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, श्रीराधाष्टमी, भाई बहन का पुनीत पर्व रक्षाबंधन, नवदुर्गा, दीपावली, होली सभी त्योहारों को बड़े ही भक्तिमय ढंग से मनाना चाहिए। इससे हमारे भीतर धर्म के प्रति जागृति बढ़ेगी और पूरे संसार का मंगल होगा। धर्म ही पुण्य कर्म है और अधर्म ही पाप कर्म है। धर्म का आचरण करना चाहिए और अधर्म से बचना चाहिए।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।