पापांकुशा एकादशी का व्रत मन को भक्ति की ओर करता है प्रेरित: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, आश्विनशुक्ल पक्ष एकादशी का विशेष महत्व है। इस एकादशी का माहात्म्य इसके नाम में ही छुपा है। इस एकादशी का नाम है श्री पापांकुशा एकादशी अर्थात् पाप पर अंकुश लगाने वाली,पाप को समाप्त करने वाली यह एकादशी है। इस एकादशी को करने से साधक के सब पाप क्षय हो जाते हैं।
पाप कर्म जो होते हैं उनका प्रभाव यह होता है कि वे भजन में मन को स्थिर नहीं होने देते। सत्कर्म की ओर मन को प्रवृत नहीं होने देते। पाप की जब अधिकता होगी तो वो किसी न किसी रूप में कष्ट देते रहेंगे। वह कष्ट शारीरिक भी होता है और मानसिक भी होता है। शारीरिक कष्ट,शरीर को दुःख देगा, मानसिक कष्ट मन को दुःख देगा। जब मन कष्ट में होगा तो उससे भजन नहीं बनेगा।
पापांकुशा एकादशी विशेष रूप से पापों को क्षय करने वाली है। वैसे सभी एकादशी पापों को क्षय करने वाली हैं पर इस एकादशी का विशेष स्वरुप पापों को क्षय करना है। इसकी कथा बहुत सुंदर है- विंध्याचल पर्वत पर एक क्रोधन नाम का बहेलिया रहता था। सारा जीवन पाप करते-करते बीत गया। जब अन्तिम समय आया तब उसे यम दूत दिखाई पड़ने लगे। वह भयभीत हो गया।
विंध्याचल की तलहटी में अंगिरा ऋषि का दर्शन हुआ। उसने अपनी पीड़ा ऋषि से कहा- उसने पूँछा क्या पाप से बचने का कोई उपाय है? अंगिरा ऋषि ने दो उपाय बताया।
पहला- पापों का प्रायश्चित कर ले।
दूसरा भगवान के नाम जप पूर्वक जीवन बिताना और एकादशी व्रत करना। ऐसा करने से पाप भी नष्ट होंगे, पाप की वृत्ति भी नष्ट होगी। और जब जीवन पूरा होगा भगवद् धाम की प्राप्ति होगी। बहेलिया ने वैसा ही किया, उसका मंगल हुआ। जब सौ वर्ष पूरा हुआ तो भगवद् धाम की प्राप्ति हुई।
पाप या भूल जीवन में होता रहता है। पापांकुशा एकादशी का उपवास रखने से जब बहेलिया का उद्धार हुआ तो भक्तों के कल्याण में क्या संदेह है। प्रत्येक वैष्णवों को एकादशी व्रत करना चाहिए और दूसरे भक्तों को भी एकादशी व्रत के लिए प्रेरित करना चाहिए। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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