Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, महाराज युधिष्ठिर ने भगवान् श्रीकृष्ण से प्रश्न किया कि- कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम क्या है? इसकी कथा कृपा करके सुनाइए।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी की बड़ी महिमा है।इसका नाम रमा एकादशी है। यह एकादशी रमा अर्थात् भगवती लक्ष्मी की कृपा प्रदान करने वाली है।अभावों को दूर करने वाली है।
मुचकुन्द नाम के राजा थे, राजा की कन्या थी जिसका नाम चन्द्रभागा था। उसका विवाह चन्द्रसेन राजा के पुत्र शोभन के साथ हुआ था। राजा मुचकुन्द की एकादशी निष्ठा अद्भुत थी। उनके यहां सभी लोग एकादशी व्रत करते थे। एकादशी के दिन कोई अन्नग्रहण नहीं करता था।
यहां तक कि पशु पक्षी भी अन्न ग्रहण नहीं करते थे। राजा की पुत्री के ससुराल वाले एकादशी नहीं करते थे। एक बार कन्या दीपावली पर माता-पिता के यहां आयी थी। चन्द्रभागा का पति शोभन भी एकादशी के एक दिन पहले आया।
बिना भाव के मजबूरी में उसने एकादशी का व्रत रखा। दैव योग से एकादशी की रात में शोभन का शरीर छूट गया।मुचकुन्द ने अपनी पुत्री को समझाते हुए कहा शरीर जब छूटना होता है तभी छूटता है, उसे कोई रोक नहीं सकता लेकिन एकादशी के दिन शरीर छूटा है इसलिए दुर्गति नहीं होगी।
मनुष्य शरीर भजन और तप के लिये मिला है। तुम्हारा जीवन जब तक है तब तक भजन-पूजन-एकादशी निष्ठा रखो,कन्या ने ऐसा ही किया. चन्द्रभागा के पति ने बिना मन के ही रमा एकादशी का व्रत कर लिया था। उसका फल मिला,अगले जन्म में मन्द्राचल पर्वत पर इन्द्र के समान वैभव प्राप्त हो गया।
मुचकुंद महाराज के यहां सोम शर्मा नाम के ब्राह्मण रहते थे। सोम शर्मा तीर्थयात्रा में मन्द्राचल पर्वत पर गये। उनको देव स्वरूप शोभन दिखाई दिया, ब्राह्मण पहचान गये। शोभन ने कहा बिना मन के ही किये गये रमा एकादशी व्रत से यह वैभव प्राप्त हो गया है लेकिन बिना मन के व्रत किया, इसलिए यह वैभव स्थिर नहीं है। अगर मेरी पत्नी मुझे एकादशी व्रत का पुण्य प्रदान करे तो यह लोग स्थिर हो सकता है।
सोम शर्मा ने वापस आकर बताया, चन्द्रभागा सोम शर्मा के साथ मन्द्राचल गयी। शोभन सपत्नी सुशोभित हुआ। उसका ऐश्वर्य स्थिर हुआ। समस्त सुखों का मूल पुण्यकर्म और भगवान की भक्ति है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।