देश की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी कोल इंडिया ने एक बड़ा और रणनीतिक फैसला लिया है, जो आने वाले वर्षों में भारत के स्टील और ऊर्जा सेक्टर की दिशा बदल सकता है. कंपनी ने घोषणा की है कि वह करीब 3,300 करोड़ रुपये का निवेश करके 8 नई कोकिंग कोल वॉशरियां स्थापित करेगी. यह कदम केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मकसद देश को कोकिंग कोल के आयात पर निर्भरता से धीरे-धीरे मुक्त करना है.
दरअसल, भारत में स्टील उत्पादन के लिए उच्च गुणवत्ता वाले कोकिंग कोल की जरूरत होती है, लेकिन घरेलू स्तर पर उपलब्ध कोयले में अशुद्धियों की मात्रा अधिक होने के कारण उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है. यही वजह है कि देश को बड़ी मात्रा में कोकिंग कोल आयात करना पड़ता है, जिससे लागत और विदेशी मुद्रा दोनों पर दबाव बढ़ता है.
8 नई वॉशरियां, 21.5 मिलियन टन की अतिरिक्त क्षमता
कोल इंडिया द्वारा स्थापित की जाने वाली इन 8 नई वॉशरियों की कुल क्षमता 21.5 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) होगी. इनका लक्ष्य 2029-30 तक पूरी तरह संचालन में लाना है. यह समयसीमा बताती है कि कंपनी इस परियोजना को लंबे समय की रणनीति के तहत आगे बढ़ा रही है.
फिलहाल कंपनी के पास 10 वॉशरियों का नेटवर्क है, जिसकी कुल क्षमता 18.35 MTPA है. अगर नई वॉशरियां समय पर शुरू हो जाती हैं, तो आने वाले चार वर्षों में कोल इंडिया की कुल वॉशिंग क्षमता लगभग दोगुनी से भी अधिक हो जाएगी. यह विस्तार भारत के कोयला क्षेत्र के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.
क्या है कोकिंग कोल वॉशरी और क्यों जरूरी है
कोकिंग कोल वॉशरी एक ऐसा औद्योगिक संयंत्र होता है, जिसमें कच्चे कोयले से राख, पत्थर और मिट्टी जैसी अशुद्धियों को अलग किया जाता है. इस प्रक्रिया के बाद जो कोयला तैयार होता है, वह उच्च गुणवत्ता का होता है और स्टील उत्पादन में उपयोग के लिए उपयुक्त माना जाता है. भारत में उपलब्ध कोयले में राख की मात्रा 25% से 45% तक होती है, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में काफी अधिक है. यही वजह है कि बिना वॉशिंग के यह कोयला स्टील उद्योग की जरूरतों को पूरी तरह पूरा नहीं कर पाता. इस समस्या को हल करने के लिए वॉशरियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है.
किन क्षेत्रों में बनेंगी ये नई इकाइयां
कोल इंडिया की योजना के तहत 8 में से 5 वॉशरियां सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड के अंतर्गत स्थापित की जाएंगी, जिनकी कुल क्षमता 14.5 MTPA होगी. वहीं बाकी 3 वॉशरियां भारत कोकिंग कोल लिमिटेड के अंतर्गत विकसित की जाएंगी, जिनकी कुल क्षमता 7 MTPA होगी. इससे दोनों सहायक कंपनियों की उत्पादन क्षमता और तकनीकी मजबूती में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा.
मौजूदा वॉशरियों का भी होगा आधुनिकीकरण
कंपनी केवल नई इकाइयों पर ही ध्यान नहीं दे रही है, बल्कि अपनी मौजूदा वॉशरियों को भी आधुनिक बनाने की दिशा में काम कर रही है. इसके लिए लगभग 300 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश किया जाएगा. इस निवेश का उद्देश्य वॉशरियों की कार्यक्षमता बढ़ाना, कोयले की रिकवरी दर में सुधार करना और पूरे प्रोसेस को अधिक भरोसेमंद बनाना है. इससे उत्पादन लागत कम हो सकती है और आउटपुट की गुणवत्ता में भी सुधार आएगा.
पुराने संसाधनों का बेहतर उपयोग, मुद्रीकरण पर जोर
कोल इंडिया अपनी बंद पड़ी या कम उपयोग में आने वाली वॉशरियों का भी बेहतर उपयोग करना चाहती है. राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन के तहत कंपनी अपनी कुछ पुरानी परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण कर रही है. एक वॉशरी के सफल मुद्रीकरण के बाद अब तीन और इकाइयों को इस प्रक्रिया में शामिल करने की योजना है. इससे कंपनी को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा और संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा.
टाटा स्टील के साथ रणनीतिक साझेदारी
कोल इंडिया ने निजी क्षेत्र की प्रमुख स्टील कंपनी टाटा स्टील के साथ भी सहयोग बढ़ाया है. इस साझेदारी का उद्देश्य वॉशिंग क्षमता और तकनीकी विशेषज्ञता का बेहतर उपयोग करना है. इसके जरिए घरेलू स्टील उद्योग को उच्च गुणवत्ता वाला कोकिंग कोल उपलब्ध कराया जा सकेगा, जिससे उत्पादन लागत कम होगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी.
आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम
भारत वर्तमान में कोकिंग कोल के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. यह न केवल महंगा पड़ता है, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव डालता है. कोल इंडिया की यह योजना इस निर्भरता को कम करने और घरेलू संसाधनों का बेहतर उपयोग करने की दिशा में एक अहम पहल है. अगर यह योजना सफल होती है, तो भारत कोकिंग कोल के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है.
यह भी पढ़े: तेल-LPG तो छोड़िए अब रूस से LNG खरीदने की तैयारी में भारत, टैरिफ की धमकी देने वाले ट्रंप काे भी सता रही चिता