GI Tag News: 2030 तक 10,000 GI रजिस्ट्रेशन का लक्ष्य, कारीगरों और किसानों को मिलेगा बड़ा फायदा

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

GI Tag News: भारत का जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) इकोसिस्टम तेजी से मजबूत हो रहा है. केंद्र सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 10,000 जीआई रजिस्ट्रेशन का है, ताकि देश की पारंपरिक विरासत, स्थानीय उत्पादों और कारीगरों को वैश्विक पहचान मिल सके. एक आधिकारिक फैक्टशीट के मुताबिक, जीआई टैग अब सिर्फ कानूनी पहचान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, निर्यात और सांस्कृतिक संरक्षण को बढ़ावा देने का मजबूत माध्यम बनता जा रहा है.

भारत में 800 से ज्यादा GI प्रोडक्ट्स रजिस्टर्ड

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में इस समय 800 से अधिक जीआई प्रोडक्ट्स रजिस्टर्ड हैं. वहीं, 2014 से अब तक 607 नए जीआई टैग दिए जा चुके हैं. पिछले एक दशक में जीआई टैग के अधिकृत यूजर्स की संख्या भी तेजी से बढ़ी है. यह आंकड़ा 365 से बढ़कर जनवरी 2025 तक करीब 29,000 पहुंच गया है.

GI रजिस्ट्रेशन की फीस में 80% तक कटौती

सरकार ने 2025 में नियमों में संशोधन करते हुए जीआई आवेदन और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं की फीस में 80 प्रतिशत तक की कमी कर दी है. इसके अलावा जीआई टैग के रिन्यूअल की फीस भी 3,000 रुपये से घटाकर 500 रुपये कर दी गई है. सरकार का मानना है कि इससे अधिक उत्पादकों और संस्थाओं को जीआई टैग के लिए आवेदन करने में आसानी होगी.

FTA से बढ़ेगी GI प्रोडक्ट्स की वैश्विक पहुंच

सरकारी बयान के मुताबिक, फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) जीआई प्रोडक्ट्स के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार का रास्ता आसान बनाते हैं. जीआई टैग किसी उत्पाद की असल पहचान और उसके मूल स्थान को प्रमाणित करता है, जबकि एफटीए व्यापारिक बाधाओं को कम कर निर्यात के अवसर बढ़ाने में मदद करता है. यही वजह है कि अब जीआई टैग भारत की अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं.

कारीगरों और किसानों को मिलेगा सीधा फायदा

जीआई टैग किसी उत्पाद को उसके मूल स्थान से जोड़ता है, जिससे पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय पहचान सुरक्षित रहती है. साथ ही इससे उत्पादों की नकल और गलत इस्तेमाल पर भी रोक लगाने में मदद मिलती है. इससे कारीगरों, बुनकरों, किसानों और उत्पादक समूहों को बाजार में बेहतर पहचान मिलती है और वे प्रीमियम बाजारों तक अपनी पहुंच बना सकते हैं.

ग्रामीण विकास और निर्यात को मिल रहा बढ़ावा

फैक्टशीट के अनुसार, सरकार वित्तीय सहायता, निर्यात को बढ़ावा देने, पर्यटन से जोड़ने और विशेष मार्केटिंग प्लेटफॉर्म के जरिए जीआई इकोसिस्टम को लगातार मजबूत कर रही है. इन पहलों का उद्देश्य जीआई उत्पादों को ग्रामीण विकास, सांस्कृतिक संरक्षण और निर्यात आधारित विकास का प्रमुख आधार बनाना है.

चन्नापटना के खिलौने बने मिसाल

सरकार ने उदाहरण देते हुए बताया कि कर्नाटक के चन्नापटना के लकड़ी के खिलौनों को वर्ष 2006 में जीआई टैग मिला था. यह पहचान केवल चन्नापटना क्षेत्र में पारंपरिक लैकरवेयर कला से बनाए गए खिलौनों को ही दी गई है. यह उदाहरण दिखाता है कि जीआई टैग किसी उत्पाद की विशिष्टता और असल पहचान को सुरक्षित रखने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

आमदनी बढ़ाने में भी मददगार है GI टैग

कपड़ा मंत्रालय के अनुसार, जीआई टैग मिलने से ग्रामीण कारीगरों की आमदनी 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ सकती है. किसी उत्पाद की उत्पत्ति और उसकी सांस्कृतिक विरासत प्रमाणित होने से ग्राहकों का भरोसा बढ़ता है और बाजार में उसकी मांग भी मजबूत होती है. इससे कारीगरों को बेहतर कीमत, प्रीमियम बाजार तक पहुंच और अपने उत्पाद की वास्तविक वैल्यू मिलने में मदद मिलती है.

कई श्रेणियों के उत्पादों को मिल चुका है GI टैग

भारत में हैंडीक्राफ्ट, कृषि उत्पाद, मैन्युफैक्चर्ड गुड्स, फूड प्रोडक्ट्स और नेचुरल प्रोडक्ट्स जैसी कई श्रेणियों में जीआई टैग दिए जा चुके हैं. सरकार का मानना है कि यह व्यवस्था आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक कारीगरी को संरक्षित रखने में भी अहम भूमिका निभाएगी.

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