भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र पिछले एक दशक में तेजी से उभरकर देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन गया है. केंद्र सरकार ने शुक्रवार को जानकारी दी कि यह क्षेत्र अब खाद्य सुरक्षा, रोजगार सृजन और निर्यात आय में अहम भूमिका निभा रहा है. सरकार के मुताबिक, वर्ष 2015 से अब तक इस क्षेत्र में कुल 39,272 करोड़ रुपए का निवेश किया जा चुका है, जिसके परिणाम अब उत्पादन, निर्यात और रोजगार के आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं.
मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अनुसार, यह क्षेत्र प्राथमिक स्तर पर करीब 3 करोड़ मछुआरों और मछली पालकों को सीधे रोजगार प्रदान करता है, जबकि इसकी पूरी वैल्यू चेन को देखें तो इससे जुड़े लोगों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाती है. इसमें मछली पकड़ने, प्रसंस्करण, परिवहन, विपणन और निर्यात से जुड़े लाखों लोग शामिल हैं, जिससे यह क्षेत्र ग्रामीण और तटीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गया है.
वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती ताकत
मंत्रालय ने बताया कि भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एक्वाकल्चर उत्पादक देश बन चुका है और वैश्विक मछली उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग 8 प्रतिशत तक पहुंच गई है. यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारत न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा कर रहा है, बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है.
मछली उत्पादन में लगातार रिकॉर्ड वृद्धि
देश में मछली उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है. वर्ष 2019-20 में जहां कुल उत्पादन 141.64 लाख टन था, वहीं 2024-25 तक यह बढ़कर 197.75 लाख टन हो गया है. यह औसतन करीब 7% की वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाता है, जो इस क्षेत्र में स्थिर और सतत विकास का संकेत है. यह वृद्धि बेहतर तकनीक, सरकारी योजनाओं, निवेश और बुनियादी ढांचे में सुधार के कारण संभव हो पाई है.
निर्यात में ऐतिहासिक उछाल
समुद्री उत्पादों के निर्यात में भी पिछले दशक के दौरान बड़ी छलांग देखी गई है. वर्ष 2013-14 में जहां निर्यात का मूल्य 30,213 करोड़ रुपए था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 62,408 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है, यानी यह दोगुना से भी अधिक हो चुका है. इस निर्यात में सबसे बड़ा योगदान झींगा (श्रिम्प) का है, जिसकी कीमत अकेले 43,334 करोड़ रुपए रही. यह दर्शाता है कि भारत वैश्विक बाजार में उच्च मूल्य वाले समुद्री उत्पादों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन चुका है.
130 देशों तक फैला भारतीय समुद्री निर्यात
भारत अब दुनिया के लगभग 130 देशों में 350 से अधिक प्रकार के समुद्री उत्पादों का निर्यात कर रहा है. वर्ष 2024-25 में कुल निर्यात का 36.42% हिस्सा अमेरिका को गया, जो भारत का सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है. इसके अलावा चीन, यूरोपीय संघ, दक्षिण-पूर्व एशिया, जापान और मध्य पूर्व जैसे क्षेत्र भी प्रमुख निर्यात बाजार के रूप में उभरे हैं. इससे यह साफ है कि भारत का समुद्री निर्यात वैश्विक स्तर पर व्यापक रूप से फैल चुका है.
वैल्यू-एडेड उत्पादों की बढ़ती हिस्सेदारी
निर्यात में वैल्यू-एडेड यानी प्रसंस्कृत उत्पादों की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ी है. पहले जहां यह केवल 2.5% थी, अब यह बढ़कर 11% तक पहुंच गई है. इन उत्पादों का कुल मूल्य करीब 742 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो यह दर्शाता है कि भारत केवल कच्चे उत्पाद ही नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्यात पर भी ध्यान दे रहा है.
नई प्रजातियों को बढ़ावा और तकनीकी निवेश
सरकार अब निर्यात को और विविध बनाने के लिए कुछ चुनिंदा उत्पादों पर निर्भरता कम कर रही है. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत ट्यूना, सीबास, कोबिया, मड क्रैब, टाइगर श्रिम्प और समुद्री शैवाल जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों को बढ़ावा दिया जा रहा है.
इसके साथ ही कोल्ड-चेन नेटवर्क, आधुनिक मछली पकड़ने के बंदरगाह और डिजिटल ट्रेसबिलिटी सिस्टम में बड़े स्तर पर निवेश किया जा रहा है, जिससे उत्पादों की गुणवत्ता और ट्रैकिंग बेहतर हो सके.
अमेरिका में निर्यात को मिला बड़ा फायदा
भारत को वर्ष 2025 में अमेरिका के समुद्री स्तनधारी संरक्षण अधिनियम के तहत कम्पैरेबिलिटी का दर्जा मिला है. इसका मतलब है कि भारत के समुद्री उत्पाद अब अमेरिका में बिना किसी रुकावट के निर्यात किए जा सकेंगे, जिससे निर्यात को और मजबूती मिलेगी.
नियमों में सुधार और तेज मंजूरी प्रक्रिया
सरकार ने नियामकीय स्तर पर भी बड़े बदलाव किए हैं. सैनिटरी इम्पोर्ट परमिट सिस्टम को पूरी तरह डिजिटल कर दिया गया है और इसे नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम से जोड़ दिया गया है. इस बदलाव के बाद मंजूरी मिलने का समय पहले 30 दिन था, जो अब घटकर केवल 72 घंटे रह गया है, जिससे कारोबार में तेजी और पारदर्शिता दोनों बढ़ी हैं.
आने वाले वर्षों की रणनीति
सरकार का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में वैल्यू-एडेड निर्यात को और बढ़ाना, इनलैंड एक्सपोर्ट हब विकसित करना और यूके, यूरोपीय संघ, एशियाई देशों तथा पश्चिम एशिया के बाजारों में भारत की मौजूदगी को और मजबूत करना है. इसके जरिए भारत वैश्विक समुद्री उत्पाद बाजार में अपनी हिस्सेदारी और बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है.
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