High Blood Pressure: सिर्फ दिल-किडनी ही नहीं, आपकी पर्सनैलिटी पर भी असर डाल सकता है हाई BP, नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

High Blood Pressure: हाई ब्लड प्रेशर को आमतौर पर दिल की बीमारी, स्ट्रोक और किडनी से जुड़ी समस्याओं के बड़े जोखिम के रूप में देखा जाता है. इसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि कई लोगों में रक्तचाप बढ़ने के बावजूद लंबे समय तक कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए इसे ‘साइलेंट किलर’ भी कहा जाता है. लेकिन अब एक नई स्टडी ने हाई ब्लड प्रेशर को लेकर अलग सवाल खड़ा किया है. शोध के मुताबिक, इसका असर केवल दिल और रक्त वाहिकाओं तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि इंसान की पर्सनैलिटी से जुड़ी कुछ विशेषताओं के साथ भी इसका संबंध हो सकता है.

जर्नल General Psychiatry में प्रकाशित शोध में खासतौर पर ब्लड प्रेशर की निचली रीडिंग यानी डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर और ‘न्यूरोटिसिज्म’ नामक व्यक्तित्व गुण के बीच संबंध पाया गया. न्यूरोटिसिज्म ऐसी पर्सनैलिटी विशेषता है, जिसमें व्यक्ति चिंता, तनाव, आत्म-संदेह और नकारात्मक भावनाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकता है. अध्ययन में सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर की तुलना में डायस्टोलिक रीडिंग का संबंध इस व्यक्तित्व गुण के साथ अधिक मजबूत दिखाई दिया.

सिस्टोलिक और डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर में क्या अंतर है?

ब्लड प्रेशर की रीडिंग दो संख्याओं में दर्ज की जाती है. ऊपर की संख्या को सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर कहा जाता है, जो उस समय नसों पर पड़ने वाले दबाव को दर्शाती है जब दिल धड़कते हुए शरीर में खून पंप करता है. वहीं नीचे की संख्या डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर कहलाती है, जो दो धड़कनों के बीच दिल के आराम की स्थिति में रक्त वाहिकाओं पर मौजूद दबाव को मापती है. नई स्टडी में शोधकर्ताओं का ध्यान इसी डायस्टोलिक रीडिंग पर गया. विश्लेषण में सामने आया कि अधिक डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर और न्यूरोटिसिज्म के बीच संबंध हो सकता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हाई BP वाले हर व्यक्ति की पर्सनैलिटी बदल जाएगी या उसमें नकारात्मक भावनाएं विकसित होना तय है.

क्या है न्यूरोटिसिज्म, जिसका स्टडी में हुआ जिक्र?

शोधकर्ताओं ने जिस व्यक्तित्व गुण का अध्ययन किया, उसे न्यूरोटिसिज्म कहा जाता है. जिन लोगों में इसका स्तर अधिक होता है, वे छोटी बातों को लेकर ज्यादा चिंता कर सकते हैं, तनाव जल्दी महसूस कर सकते हैं और खुद पर संदेह करने की प्रवृत्ति अधिक हो सकती है. ऐसे लोग नकारात्मक भावनाओं से जल्दी प्रभावित हो सकते हैं और आलोचना को भी अधिक गंभीरता से ले सकते हैं. तनावपूर्ण परिस्थितियों से निपटने में भी ऐसे लोगों को अधिक कठिनाई हो सकती है. इसके अलावा उनमें आगे चलकर चिंता और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं का खतरा अधिक होने की संभावना बताई गई है. स्टडी में हाई डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर का सबसे मजबूत संबंध इसी व्यक्तित्व विशेषता के साथ सामने आया.

एक हजार से अधिक आनुवंशिक संकेतकों का विश्लेषण

ब्लड प्रेशर और व्यक्तित्व के बीच संबंध को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने मेंडेलियन रैंडमाइजेशन नामक तकनीक का इस्तेमाल किया. इस पद्धति में आनुवंशिक जानकारी की मदद से यह समझने की कोशिश की जाती है कि दो स्थितियों के बीच दिखने वाला संबंध संभावित कारण और परिणाम की दिशा में इशारा करता है या केवल संयोग हो सकता है. वैज्ञानिकों ने ब्लड प्रेशर से जुड़े एक हजार से अधिक आनुवंशिक संकेतकों का विश्लेषण किया. इसके साथ ही यूरोपीय मूल के लोगों पर आधारित आठ बड़े अध्ययनों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया. इसी विश्लेषण के दौरान डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर और न्यूरोटिसिज्म के बीच संबंध सामने आया.

क्या हाई BP सीधे चिंता और अवसाद का कारण बनता है?

स्टडी में अधिक डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर वाले लोगों में न्यूरोटिसिज्म का स्तर अधिक देखने को मिला, लेकिन शोधकर्ताओं को ऐसा स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला कि हाई ब्लड प्रेशर सीधे तौर पर चिंता या अवसाद का कारण बनता है. अध्ययन में सबसे मजबूत संबंध न्यूरोटिसिज्म के साथ ही पाया गया. इस अंतर को समझना जरूरी है, क्योंकि किसी व्यक्तित्व गुण के साथ संबंध मिलना और किसी मानसिक समस्या का प्रत्यक्ष कारण साबित होना एक ही बात नहीं है. इसलिए स्टडी के नतीजों को इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि हाई BP होने से किसी व्यक्ति को चिंता या अवसाद होना तय है.

दिल और दिमाग के बीच कैसे बन सकता है संबंध?

वैज्ञानिकों का मानना है कि लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर बने रहने से दिमाग की छोटी रक्त वाहिकाएं प्रभावित हो सकती हैं. इसका असर मस्तिष्क के उन हिस्सों पर पड़ने की संभावना है, जो भावनाओं और तनाव को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं. दूसरी संभावना यह भी है कि जो लोग पहले से ज्यादा तनावग्रस्त या चिंतित रहते हैं, उनमें समय के साथ ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है. इस आधार पर वैज्ञानिकों ने यह संभावना जताई है कि रक्तचाप और भावनात्मक तनाव के बीच संबंध दोनों दिशाओं में काम कर सकता है.

अभी और रिसर्च की जरूरत

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस अध्ययन को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए. शोध में यूरोपीय मूल के लोगों पर आधारित अध्ययनों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है, इसलिए अलग-अलग देशों और विभिन्न समुदायों में इस संबंध को समझने के लिए आगे और रिसर्च की जरूरत है. यह भी अभी स्पष्ट नहीं है कि अगर किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर नियंत्रित कर दिया जाए तो क्या उसकी पर्सनैलिटी से जुड़ी विशेषताओं में भी बदलाव आएगा. इसके बावजूद यह अध्ययन दिल, रक्तचाप, दिमाग और भावनात्मक व्यवहार के बीच संभावित संबंध को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण जानकारी देता है.

ब्लड प्रेशर को नियंत्रण में रखना क्यों जरूरी?

हाई ब्लड प्रेशर पहले से ही दिल की बीमारियों, स्ट्रोक और किडनी से जुड़ी समस्याओं का बड़ा जोखिम माना जाता है. नई स्टडी ने इसके साथ पर्सनैलिटी के एक विशेष गुण के संभावित संबंध की ओर भी ध्यान खींचा है. ऐसे में रक्तचाप को नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण है. इसके लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, धूम्रपान और शराब से दूरी तथा तनाव कम करने की कोशिश जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं. जिन लोगों को डॉक्टर ने ब्लड प्रेशर की दवाएं दी हैं, उन्हें चिकित्सकीय सलाह के अनुसार दवाएं लेते रहना चाहिए.

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