मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर में रविवार को धार्मिक उत्साह का माहौल देखने को मिला. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले के बाद बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धालु यहां पहुंचे और मां वाग्देवी की पूजा-अर्चना की. परिसर में “जय मां सरस्वती” के जयकारे गूंजते रहे और भक्तों ने फैसले को ऐतिहासिक बताया.

सुबह से लगी श्रद्धालुओं की लंबी कतार
फैसले के अगले दिन ही भोजशाला परिसर के बाहर सुबह से श्रद्धालुओं की भीड़ जमा होने लगी. लोगों ने पूजा-पाठ, भजन और आरती कर अपनी आस्था व्यक्त की. कई श्रद्धालुओं ने कहा कि वर्षों बाद उन्हें खुले रूप से पूजा करने का अवसर मिला है. प्रशासन ने सुरक्षा के मद्देनजर इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया.
क्या कहा हाईकोर्ट ने?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने पांच याचिकाओं और तीन इंटरवेंशन के बाद यह फ़ैसला सुनाया है. इंदौर खंडपीठ ने अपने फैसले में भोजशाला परिसर को देवी वाग्देवी (मां सरस्वती) का मंदिर माना है. अदालत ने कहा कि यह स्थल प्राचीन काल से हिंदू धार्मिक और संस्कृत शिक्षा का केंद्र रहा है। कोर्ट ने एएसआई के वर्ष 2003 के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी गई थी.
फैसले में किन बातों को बनाया आधार
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में पुरातात्विक साक्ष्यों, शिलालेखों और मंदिर शैली की वास्तुकला को अहम माना. अदालत ने कहा कि भोजशाला में हिंदू पूजा की परंपरा पूरी तरह कभी समाप्त नहीं हुई। साथ ही परिसर के संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और केंद्र सरकार को सौंपी गई है.
मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट जाने के दिए संकेत
दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष ने हाईकोर्ट के फैसले पर असहमति जताई है. कमाल मौला मस्जिद समिति और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे. इसके बाद मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक चर्चाएं भी तेज हो गई हैं.
वर्षों पुराना विवाद फिर चर्चा में
करीब 700 साल पुराने भोजशाला विवाद पर आए इस फैसले ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले इस स्थल पर अब आगे की कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक व्यवस्था पर सभी की नजर बनी हुई है.