New Delhi: चीन ने पहली बार यह स्वीकार किया है कि उसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान को ऑन-ग्राउंड तकनीकी मदद दी थी. भारत ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही चीन पर आरोप लगाता रहा है कि उसने पाकिस्तान की इस लड़ाई में मदद की थी. इससे जुड़ी रिपोर्ट साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट पर सामने आई है. इसके मुताबिक चीनी सरकारी मीडिया CCTV ने गुरुवार को एक इंटरव्यू प्रसारित किया.
पाक आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर
इस इंटरव्यू में चीन की एविशन इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन (AVIC) के चेंगदू एयरक्राफ्ट डिजाइन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के इंजीनियर झांग हेंग ने इस बात की पुष्टि की. उन्होंने बताया कि वह पाकिस्तान में मौजूद रहकर तकनीकी सपोर्ट दे रहे थे. भारत ने पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था. इस दौरान पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ था.
यह सिर्फ भारत-पाकिस्तान का टकराव नहीं
पहले से ही यह संदेह जताया जाता रहा है कि चीन ने इस दौरान हर तरह की मदद पाकिस्तान को दी. अब इस कबूलनामे ने साफ कर दिया है कि यह सिर्फ भारत-पाकिस्तान का टकराव नहीं था, बल्कि इसमें चीन की एक्टिव होकर लड़ रहा था. झांग हेंग ने इंटरव्यू में बताया कि जिस बेस पर उनकी टीम तैनात थी, वहां लगातार फाइटर जेट्स के उड़ान भरने की आवाजें और एयर-रेड सायरन सुनाई देते थे.
तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के करीब
उन्होंने कहा कि मई के महीने में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच जाता था, जिससे हालात बेहद कठिन हो गए थे. इसके बावजूद उनकी टीम का फोकस यह सुनिश्चित करना था कि उपकरण पूरी क्षमता के साथ काम करें. वहीं एक अन्य इंजीनियर जू दा ने J-10C फाइटर जेट को ‘बच्चे’ की तरह बताया. वहीं दूसरी तरफ एक अन्य रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले साल भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान, जब पाकिस्तान के रक्षा प्रणालियों को रियल-टाइम टारगेटिंग, एकीकृत वायु रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के विरुद्ध परखा गया तो वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे.
पाक के एयरफील्ड, हैंगर को काफी नुकसान
रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीय हमलों से पाकिस्तान के एयरफील्ड, हैंगर और रडार सिस्टम को काफी नुकसान पहुंचा. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का एचक्यू-9 लंबी दूरी वाला सतह से हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम भी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाया. इसे चीन के एक हाई-एंड सिस्टम के तौर पर पेश किया गया था, जो पश्चिमी और रूसी सिस्टम को टक्कर देने वाला माना जाता था. माना जा रहा था कि यह भारतीय एयर ऑपरेशंस को मुश्किल बना देगा और रणनीतिक एयर बेस की रक्षा करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
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