Hangari: हंगरी के बुडापेस्ट में गेलर्ट पहाड़ी के नीचे डेन्यूब नदी की गहराई में सदियों पुराना एक ऐतिहासिक चट्टानी छिपा हुआ है, जिसे ‘भुखमरी का पत्थर’ कहा जाता है. पहले जब भी यह चट्टान पानी के ऊपर दिखाई देती थी, तो इसे इस बात का खौफनाक संकेत माना जाता था कि नदी का पानी इतना कम हो चुका है कि पानी से चलने वाली पवनचक्की वाली मिलें बंद हो जाएंगी, फसलें सूख जाएँगी और चारों तरफ भुखमरी फैल जाएगी.
बता दें कि इस समय इन नदी के नीचे का रेतीला तल भी पूरी तरह से दिखने लगा है, जिसने वैज्ञानिकों और भूविज्ञानियों को भी हैरान कर दिया है. दरअसल, डेन्यूब नदी का जलस्तर आम दिनों में 2 से 3 मीटर और बाढ़ के समय 8 मीटर तक रहता है, लेकिन इस भीषण गर्मी में यह घटकर रिकॉर्ड 14 से 19 सेंटीमीटर पर आ गया है.
हंगरी में एक ऊर्जा संकट
यूरोपीय संघ की इस नदी के सूखने से हंगरी में एक ऊर्जा संकट खड़ा हो गया है. इसके चलते 44 सालों में पहली बार देश को अपने परमाणु ऊर्जा संयंत्र के ज्यादातर रिएक्टरों को बंद करने पर मजबूर होना पड़ा है. पानी का स्तर इतना गिर गया कि नदी का तल किसी रेगिस्तान की तरह दिखने लगा, जिससे वर्षों से गहराई में छिपे ऐतिहासिक अवशेष बाहर आ गए. इनमें दूसरे विश्व युद्ध के समय नष्ट हुआ एक पुल, एक नाजी युद्धपोत, द्वितीय विश्व युद्ध का एक बिना फटा ब्रिटिश बम और यहां तक कि एक प्राचीन ऊनी मैमथ के अवशेष भी शामिल हैं.
आम नागरिकों और किसानों पर गहरा प्रभाव
वहीं, इस आपदा की गंभीरता को दुनिया के सामने लाने के लिए एक साइक्लिंग संगठन के प्रमुख गॉबोर कुर्ती ने नदी के सूखे पड़े तल पर 30 किलोमीटर तक साइकिल चलाई, जिसे उन्होंने अपने जीवन का सबसे दुखद और दिल तोड़ने वाला अनुभव बताया. इस भीषण सूखे का सबसे दर्दनाक असर आम नागरिकों, गरीबों और किसानों के दैनिक जीवन पर पड़ा है.
नदी किनारे बसे पोक्समे ग्येर जैसे गांवों के किसानों की 50 से 70 प्रतिशत तक फसलें पूरी तरह सूखकर नष्ट हो चुकी हैं. सेंटेंड्रे जैसे कलात्मक कस्बों में पानी की किल्लत इतनी बढ़ गई कि 4000 से 5000 परिवार बिना पानी के रह गए. उन्हें सहायता एजेंसियों द्वारा बांटी जा रही बोतलबंद पानी की बोतलों पर निर्भर होना पड़ा.
इंसानों द्वारा पैदा किए गए जलवायु परिवर्तन का नतीजा
गर्मी में बिजली की खपत घटाने के लिए शाम के सांस्कृतिक कार्यक्रम तक मोमबत्तियों की रोशनी में आयोजित किए जा रहे हैं. वहीं ग्रामीण इलाकों में पानी की आपूर्ति बनाए रखने के लिए सेना के टैंकरों का सहारा लिया जा रहा है. नदी के उथले पानी में छिपे गहरे गड्ढों के कारण लोगों के डूबने के हादसे भी बढ़ गए हैं. दूसरी ओर, सरकार दलदली इलाकों और जीवों की रक्षा के लिए वन्यजीव अभयारण्यों में कृत्रिम रूप से पानी पंप कर रही है.
स्थानीय निवासियों और वैज्ञानिकों का मानना है कि यह कोई एक साल की अस्थाई आपदा नहीं है, बल्कि इंसानों द्वारा पैदा किए गए जलवायु परिवर्तन का स्थायी नतीजा है, जिसके कारण आने वाले सालों में गर्मी और सूखे का यह भयानक सिलसिला और भी गंभीर रूप ले सकता है.

