अफ़ग़ान से युद्ध के बीच PAK को बड़ा झटका, बलोच नेता ने किया तालिबान का समर्थन, एक होने की अपील

New Delhi: अफ़ग़ानिस्तान- पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध के बीच बलोच नेता हाइरबायर मर्री ने तालिबान का समर्थन किया है. अपने बयान में मार्री ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने अफगान नागरिकों के खिलाफ उकसावे के बिना हवाई और ड्रोन हमले किए हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन हैं. मार्री ने बलोचिस्तान पर जबरन कब्ज़े और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी दोहराए.

PAK को दी खुली छूट

उन्होंने कहा कि अफगान और बलोच समुदायों को एकजुट होकर अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा करनी चाहिए. अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी ने पाकिस्तान को खुली छूट दे दी है, जिससे वह अफगानिस्तान और बलूचिस्तान दोनों में कार्रवाई जारी रखे हुए है. मार्री ने तथाकथित डुरंड लाइन का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि इस सीमा विवाद पर पहले ही वैश्विक स्तर पर हस्तक्षेप हुआ होता तो आज क्षेत्र की स्थिति अलग होती.

समय-समय पर वैधता अस्वीकार

उन्होंने दावा किया कि अफगान इतिहासकारों के अनुसार अमीर अब्दुर रहमान खान ने इस समझौते को न तो स्वीकार किया और न ही उस पर हस्ताक्षर किए. साथ ही अफगान पारंपरिक महासभा लोया जिगरा द्वारा भी समय-समय पर इसकी वैधता को अस्वीकार किया जाता रहा है. उन्होंने कहा कि बलोच और अफगान समुदाय पहले भी बाहरी शक्तियों के खिलाफ साथ खड़े रहे हैं.

कलात किले के संघर्ष का उल्लेख

उन्होंने बोलन दर्रे और कलात किले के संघर्ष का उल्लेख किया, जिसमें बलोच शासक खान मेहराब खान के बलिदान की बात कही. मार्री ने 1709 के घटनाक्रम का भी जिक्र किया, जब बलोच योद्धाओं ने मिरवाइस खान होतक के नेतृत्व में फारसी सत्ता के खिलाफ संघर्ष में भूमिका निभाई थी. उन्होंने दावा किया कि गुलनाबाद, इस्फहान की घेराबंदी और खाबिस की लड़ाइयों में बलोचों ने निर्णायक योगदान दिया.

भारत के साथ नहीं चाहता टकराव

अपने बयान में मार्री ने कहा कि एक स्वतंत्र बलोचिस्तान पड़ोसी देशों, विशेषकर अफगानिस्तान और भारत के साथ टकराव नहीं चाहता. उन्होंने आरोप लगाया कि हालिया क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान पाकिस्तान द्वारा भारतीय अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए हवाई क्षेत्र बंद करने से भारी आर्थिक नुकसान हुआ.

मुस्लिम देशों की चुप्पी पर भी सवाल

मार्री ने इस्लामिक सहयोग संगठन Organisation of Islamic Cooperation (OIC) और अन्य मुस्लिम देशों की कथित चुप्पी पर भी सवाल उठाए और कहा कि कुछ मुद्दों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी जाती है, जबकि अन्य विवादों पर मौन साध लिया जाता है.

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