NASA Mars Mission: मंगल ग्रह की मिट्टी में क्या खोज रहा है APXS? हजारों रिपोर्ट भेज चुका है खास सेंसर

Shivam
Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Must Read
Shivam
Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Mars Mission: मंगल ग्रह को लेकर दुनियाभर के वैज्ञानिक लगातार नई खोजों में जुटे हुए हैं. लाल ग्रह की सतह, वहां की मिट्टी, चट्टानों और वातावरण को समझने के लिए कई देशों की स्पेस एजेंसियां लंबे समय से मिशन चला रही हैं. इसी बीच कनाडा के अत्याधुनिक अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (APXS) ने मंगल ग्रह पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है. यह खास वैज्ञानिक उपकरण अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के क्यूरियोसिटी रोवर पर लगाया गया है और पिछले कई सालों से लगातार मंगल ग्रह की सतह का अध्ययन कर रहा है.

अब तक यह उपकरण 1761 नमूनों का विश्लेषण कर चुका है और 3943 वैज्ञानिक परिणाम पृथ्वी तक भेज चुका है. इन आंकड़ों की मदद से वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि मंगल ग्रह की सतह किन तत्वों से बनी है, वहां का वातावरण पहले कैसा रहा होगा और क्या कभी वहां जीवन के अनुकूल परिस्थितियां मौजूद थीं.

कनाडाई स्पेस एजेंसी ने साझा की बड़ी जानकारी

कनाडाई स्पेस एजेंसी ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर एपीएक्सएस से जुड़ा अपडेट साझा किया है. एजेंसी के मुताबिक यह उपकरण मंगल ग्रह की मिट्टी और चट्टानों की रासायनिक संरचना को समझने में बेहद अहम भूमिका निभा रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि मंगल ग्रह पर मौजूद खनिजों और तत्वों का अध्ययन भविष्य में वहां मानव मिशन भेजने की तैयारी में काफी मदद करेगा. इसके जरिए यह भी पता लगाया जा रहा है कि अरबों साल पहले मंगल ग्रह पर पानी या जीवन जैसी परिस्थितियां मौजूद थीं या नहीं.

आखिर कैसे काम करता है APXS?

अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर आकार में लगभग एक रूबिक क्यूब जैसा दिखाई देता है. इसे क्यूरियोसिटी रोवर की रोबोटिक भुजा के सिरे पर लगाया गया है ताकि यह सीधे मिट्टी और चट्टानों के संपर्क में जाकर उनका परीक्षण कर सके. जब क्यूरियोसिटी रोवर किसी चट्टान या मिट्टी के नमूने के पास पहुंचता है, तब यह उपकरण उस नमूने पर एक्स-रे और अल्फा कणों की बौछार करता है.

इसके बाद नमूने से निकलने वाली ऊर्जा का अध्ययन कर वैज्ञानिक उसकी रासायनिक संरचना का पता लगाते हैं. यह उपकरण बेहद सूक्ष्म स्तर पर मौजूद तत्वों की पहचान करने में सक्षम माना जाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह किसी चट्टान या मिट्टी में मौजूद छोटे से छोटे खनिज और तत्व का भी पता लगा सकता है.

एक नमूने की जांच में लगते हैं कई घंटे

वैज्ञानिकों के मुताबिक किसी नमूने का विस्तृत विश्लेषण करने में एपीएक्सएस को करीब 2 से 3 घंटे का समय लग सकता है. वहीं अगर केवल त्वरित जांच करनी हो तो यह प्रक्रिया लगभग 10 मिनट में पूरी हो जाती है. इसी वजह से यह उपकरण मंगल ग्रह की सतह से लगातार महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी जुटाने में सफल रहा है. अब तक भेजे गए हजारों डेटा वैज्ञानिकों के लिए काफी अहम माने जा रहे हैं.

2024 में हुई थी बड़ी खोज

साल 2024 में एपीएक्सएस ने मंगल ग्रह पर एक बेहद महत्वपूर्ण खोज में अहम भूमिका निभाई थी. दरअसल क्यूरियोसिटी रोवर जब एक चट्टान के ऊपर से गुजरा तो वह चट्टान टूट गई. उस चट्टान के अंदर वैज्ञानिकों को शुद्ध सल्फर के क्रिस्टल मिले थे. मंगल ग्रह पर पहली बार इस तरह के सल्फर क्रिस्टल मिलने से वैज्ञानिक काफी उत्साहित हो गए थे. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस खोज से मंगल ग्रह के पुराने वातावरण, वहां मौजूद जलवायु और प्राकृतिक परिस्थितियों को समझने में बड़ी मदद मिल सकती है. यह खोज इस बात की तरफ भी इशारा करती है कि मंगल ग्रह का भूगर्भीय इतिहास पहले की सोच से कहीं ज्यादा जटिल हो सकता है.

दिन-रात लगातार सक्रिय रहता है उपकरण

कनाडाई स्पेस एजेंसी के मुताबिक एपीएक्सएस दिन और रात दोनों समय लगातार काम कर सकता है. यह उपकरण एक थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर से संचालित होता है, जो लगातार ऊर्जा पैदा करता है. इसी वजह से क्यूरियोसिटी रोवर को पूरी तरह सौर ऊर्जा पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.

मंगल ग्रह की कड़ाके की ठंड और धूल भरे वातावरण में भी यह रोवर सक्रिय बना रहता है. मंगल ग्रह पर कई बार धूल भरी आंधियां चलती हैं, जिनकी वजह से सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरणों को परेशानी होती है, लेकिन थर्मोइलेक्ट्रिक सिस्टम की वजह से क्यूरियोसिटी रोवर लगातार अपना काम जारी रख पाता है.

36 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय

1 फरवरी 2026 तक क्यूरियोसिटी रोवर मंगल ग्रह की सतह पर 36.2 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका है. इस दौरान उसने हजारों वैज्ञानिक आंकड़े पृथ्वी तक भेजे हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन आंकड़ों की मदद से भविष्य में मंगल ग्रह पर मानव मिशन भेजने की तैयारी को मजबूत किया जा सकेगा. साथ ही यह भी समझने में मदद मिलेगी कि क्या भविष्य में इंसान मंगल ग्रह पर रह सकते हैं.

2029 तक जारी रहेगा मिशन

कनाडा ने इस मिशन में अपनी भागीदारी मार्च 2029 तक बढ़ा दी है. ऐसे में आने वाले वर्षों में एपीएक्सएस से और भी कई अहम खोजों की उम्मीद की जा रही है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि मंगल ग्रह से मिलने वाले ये नए डेटा अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में कई बड़े खुलासे कर सकते हैं. आने वाले समय में यही जानकारियां मंगल ग्रह पर भविष्य के मानव मिशनों और वहां जीवन की संभावनाओं को समझने की दिशा तय कर सकती हैं.

यह भी पढ़े: Gorakhpur: कुशीनगर-लखनऊ फोरलेन ट्रक-डंपर की टक्कर, लगी आग, जिंदा जले चालक-क्लीनर

Latest News

अच्छे विद्यालय के स्पर्श से संवर जाता है छात्र का जीवन: डा. दिनेश शर्मा

Highlights स्पर्श ग्लोबल बिजनेस स्कूल में पीजीडीएम बैच के नए सत्र का शुभारंभ हुआ. मुख्य अतिथि डॉ. दिनेश शर्मा...

More Articles Like This