Pakistan economic crisis: पाकिस्तान में एक ओर ईरान युद्ध के कारण लगातार डीजल-पेट्रोल और गैस का संकट है तो अब रोटी के भी लाले पड़ते नजर आ रहे है. दरअसल, पाकिस्तान में गेहूं की फसल ने धोखा दे दिया है. ऐसे में हालत ये है कि आटे का संकट सिर पर खड़ा है. यानी पाकिस्तान इस समय खाने और ईंधन, दोनों मोर्चों पर डबल मार झेल रहा है.
पाकिस्तान मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान का गेहूं सेक्टर एक बार फिर बड़े संकट में फंस गया है. ऐसे में पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज ने आदेश दिया है कि जिन व्यापारियों के पास गेहूं का स्टॉक है, वे दो हफ्ते के अंदर उसका पूरा ब्योरा दें, वरना उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी. दरअसल, पाकिस्तान की सरकार को डर है कि गेहूं की कमी की वजह से आने वाले महीनों में आटे के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं.
पाकिस्तान को अपनी जरूरत भर भी नहीं मिल पाएगा गेहूं
बता दें कि पाकिस्तान में गेहूं का संकट ऐसे समय में हुआ है जब मार्च और अप्रैल में ही गेहूं की फसल काटी गई है. वहीं पंजाब कृषि विभाग का अनुमान है कि इस बार औसतन करीब 33 मन प्रति एकड़ गेहूं उत्पादन हुआ है. लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर गेहूं की फसल सालाना जरूरत से 20 फीसदी से ज्यादा कम रह सकती है. यानी पाकिस्तान को अपनी जरूरत भर गेहूं भी नहीं मिल पाएगा.
दाम बढ़ने पर सरकार कर रही कार्यवाही
पाकिस्तान में यह संकट ऐसे समय आया है, जब दुनिया के अनाज बाजार पहले ही रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट तनाव की वजह से हिले हुए हैं. ऊपर से पाकिस्तान की सरकारी खरीद नीति और रिजर्व मैनेजमेंट ने हालात और बिगाड़ दिए हैं. पाकिस्तान किसान इत्तेहाद के अध्यक्ष खालिद खोखर ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि जब किसान बेहद कम दाम पर गेहूं बेचने को मजबूर थे, तब सरकार सो रही थी. अब जब दाम बढ़ने लगे, तब जाकर कार्रवाई की जा रही है.
पाकिस्तान में क्यों हुआ गेहूं का संकट?
दरअसल, भारत की तरफ से पिछले साल सिंधु जल समझौता सस्पेंड कर दिया गया था, जिससे पाकिस्तान को मिलने वाले पानी में कमी आई. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या पाकिस्तान में गेहूं संकट के पीछे भारत है? तो ऐसा बिल्कुल नहीं है, बल्कि पाकिस्तान के खुद के कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हैं. जैसे पाकिस्तान में ढंग की सिचाई व्यवस्था न होना, पुरानी नहरें, ग्राउंड वाटर की कमी जैसी चीजें भी इसके कारण हैं.
आटा मिल उद्योग ने भी सरकार को ठहराया जिम्मेदार
इसी बीच, खालिद खोखर ने कहा कि खाद, डीजल, बिजली और मजदूरी की लागत इतनी बढ़ गई है कि किसानों के लिए गेहूं उगाना घाटे का सौदा बन गया है. आटा मिल उद्योग ने भी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि नियमों में बार-बार बदलाव, फाइनेंसिंग में देरी और स्टॉक पर छापेमारी जैसी नीतियों ने बाजार का भरोसा तोड़ दिया. नतीजा यह हुआ कि व्यापारी गेहूं निजी गोदामों में रखने लगे और बाजार में सप्लाई और घट गई.
पाकिस्तान की मुश्किल केवलआटे तक सीमित नहीं
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह केवल जमाखोरी का मामला नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों की गड़बड़ी का नतीजा है. उनका मानना है कि निजी क्षेत्र को खुली भूमिका, लचीली कीमतें और गरीबों के लिए टारगेटेड सब्सिडी ही इस संकट का हल हो सकती है. लेकिन पाकिस्तान की मुश्किल केवलआटे तक सीमित नहीं है. ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध ने तेल के मोर्चे पर भी पाकिस्तान की हालत खराब कर दी है. दुनिया भर में तेल की कीमतों में उछाल के बाद पाकिस्तान का मासिक तेल आयात बिल करीब 30 करोड़ डॉलर से बढ़कर 60 से 80 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है. यानी तेल खरीदने का खर्च लगभग दोगुना हो गया है.