Washington: ईरान से युद्ध के बीच अमेरिका ने सऊदी अरब को बडी राहत दी है. ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ एक ऐसे परमाणु सहयोग समझौते का मसौदा तैयार किया है, जिसके तहत सऊदी अरब को अपने असैन्य परमाणु कार्यक्रम के लिए यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल सकती है. हालांकि, यह समझौता अभी पूरा होने के बावजूद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर का इंतजार कर रहा है और इसे अब तक अमेरिकी कांग्रेस को भी नहीं भेजा गया है.
Protocol को अपनाना अनिवार्य नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रस्ताव इसलिए विवादों में है क्योंकि इसमें सऊदी अरब के लिए International Atomic Energy Agency (IAEA) के सबसे कड़े निरीक्षण तंत्र Additional Protocol को अपनाना अनिवार्य नहीं बनाया गया है. इसके बजाय अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक अलग सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर भरोसा किया गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस समझौते को मंजूरी मिल जाती है, तो बिना सख्त सुरक्षा उपायों के सऊदी अरब के लिए परमाणु हथियार विकसित करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है.
सऊदी भी विकल्प खुला रखेगा
सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि यदि ईरान परमाणु बम बनाता है, तो सऊदी अरब भी इसका विकल्प खुला रखेगा. ट्रम्प और जो बाइडेन दोनों ने अमेरिकी प्रौद्योगिकी साझा करने के लिए सऊदी अरब के साथ परमाणु समझौता करने की कोशिश की. परमाणु अप्रसार विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सऊदी अरब के भीतर कोई भी चालू सेंट्रीफ्यूज (सेंट्रीफ्यूज) किंगडम के लिए एक संभावित हथियार कार्यक्रम का रास्ता खोल सकता है, जिसे सऊदी अरब के मुखर युवराज ने परमाणु बम प्राप्त होने की स्थिति में आगे बढ़ाने का संकेत दिया है.
असली चुनौती बारीकियों में छिपी
वाशिंगटन स्थित शस्त्र नियंत्रण संघ में अप्रसार नीति की निदेशक केल्सी डेवनपोर्ट ने लिखा, “परमाणु सहयोग अप्रसार मानदंडों को बनाए रखने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए एक सकारात्मक तंत्र हो सकता है, लेकिन असली चुनौती बारीकियों में छिपी है.”
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