Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, श्रीमद्भागवत महापुराण में गोवर्धन पूजा के अवसर पर भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि- सब कुछ कर्मों के आधीन है। कर्मों के अनुसार ही व्यक्ति का जन्म होता है और कर्मों के अनुसार ही उसकी मृत्यु होती है, दुःख-सुख,भय-क्षेम सब उसके कर्मों के अनुसार ही प्राप्त होता है।
हमारे आपके जीवन में किसी प्रकार का कोई सुख है तो वह हमारे ही किसी पुण्य कर्म का फल है और जीवन में किसी प्रकार का भी दुःख है तो हमारे आपके ही किसी जन्म के पापकर्म का ही फल है। पुण्य के बिना सुख नहीं हो सकता और पाप के बिना दुःख नहीं हो सकता। जैसे दो और दो चार होता है इस सिद्धान्त को कोई काट नहीं सकता, वैसे ही कर्म के सिद्धान्त को भी काटा नहीं जा सकता।
भलाई की भावना से किया गया प्रत्येक कर्म, पुण्य कर्म की श्रेणी में आता है। दूसरों की भलाई, परिवार की भलाई, और अपनी भलाई इसमें शामिल है। हमारा आपका भला कौन सा कर्म करने में है, यह बात सत्संग, स्वाध्याय, चिन्तन से पता लगता है। अधिकतर लोग जो कर्म कर रहे हैं वह असावधानी से कर रहे हैं। ऐसा कर्म कर रहे हैं जिससे उनकी स्वयं की हानि होने वाली है।
किसी को भी हानि पहुंचाने की भावना से किया गया प्रत्येक कर्म पाप कर्म की श्रेणी में आता है। बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो सदैव पुण्य कर्म का संचय करता है और पाप कर्म से बचता रहता है। तीर्थ भूमि में किया हुआ सत्कर्म अधिक श्रेयस्कर होता है।
जो पुण्य के काम में सहयोग देता है, वह भी पुण्य का भागी बनता है। मान-अपमान में मन को शान्त रखना महान पुण्य का कार्य है। तीर्थ में मौज-शौक के लिए नहीं, तप करके पवित्र होने के लिए जाना चाहिए। पाप न करना ही महान पुण्य है।सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।