मन की मृत्यु होने पर प्राप्त होती है मुक्ति: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, जिसका जीवन सादा है, वही सच्चा साधु है। शरीर के मरने पर मुक्ति नहीं मिलती। मुक्ति तो मन की मृत्यु होने पर प्राप्त होती है। मन की मृत्यु ही मोक्ष है। जहाँ भेद-बुद्धि होती है, वही भय दिखाई देता है।
मन को प्रभु-प्रेम से आप्लावित कर दो। मन मर जायेगा, जीवन तर जायेगा।श्रीशिवमहापुराण में कथा आती है कि हिरण्याक्ष का नाश करके वराहनारायण ने पृथ्वी का उद्धार किया। यह हिरण्याक्ष है सोने और सम्पत्ति पर आँख लगाने वाला लोभ और वराह का अर्थ है – जो मुझे मिलता है उसे उत्तम मानकर किया गया संतोष।
संतोष के द्वारा लोभ का नाश होगा, तभी जीवन में शांति मिलेगी। जहाँ तक लोभ है, वहाँ तक सत्कर्म में प्रीति पैदा नहीं होती। मनुष्य को जो मिला है, उसमें संतोष नहीं है। उसे तो जो नहीं मिला है, वही चाहिए। इसीलिए वह उसके पीछे-पीछे भटकता रहता है और जीवन की शान्ति खो बैठता है। मनुष्य लोभ छोड़ नहीं सकता, इसीलिए वह सत्कर्म नहीं कर सकता।
लोभ छोड़कर संतोषपूर्वक जीवन व्यतीत करोगे, तभी सत्कर्म में प्रीति पैदा होगी और सर्वेश्वर की प्राप्ति होगी।मृत्यु के समय तो जीवन में किया हुआ नाम-स्मरण और सत्कर्म ही साथ जाता है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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