गणेश जी हरि भक्ति का देते हैं वरदान: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Must Read
Shivam
Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा,श्री वरदमूर्ति गणेश जी विपुल विद्या, अतुल धन, सुदीर्ध आयु आदि का वरदान तो सभी भक्तों को देते हैं। किन्तु हरि भक्ति का वरदान वो केवल अन्तरंग भक्तों को देते हैं। निम्बराज नाम के एक बड़े हरि भक्त थे। एक रात जब वे पूर्ण रूप से निद्राधीन थे। तब स्वपन में श्रीगणेशजी ने उन्हें एक ऐसा मधुर पान का बीड़ा खिलाया कि उस बीड़े से निम्बराज को हरि कीर्तन की महान स्फूर्ति प्रदान हुई।
श्रीगणेशजी के इस वर प्रसाद से श्री निम्बराज श्री हरि कीर्तन के प्रेम में सदा मग्न रहने लगे। जिससे उनका जीवन सफल हो गया। इस हरि कीर्तन प्रेम का वरदान हम सबको श्रीगणेशजी अवश्य दें। यही उन वरदमूर्ति से प्रार्थना है। श्री गणराज के इस अमोघ वरदायित्व का लाभ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों एवं देवताओं को उन्मुक्त रूप से प्राप्त हुआ।
 वेदव्यास ने जब पुराणों की रचना आरम्भ की उस समय श्रीगणेशजी का स्मरण न करने के कारण उनको सब कुछ विस्मरण हो गया। श्री ब्रह्मा जी के कथनानुसार गणेशोपासना करने से वरदाता प्रसन्न हुए। तब श्री व्यास जी को उपपुराण सहित अठारहों पुराण की रचना का श्रेय मिला।
मधुकैटभ आदि राक्षसों को मारने के लिये महाविष्णु ने श्रीगणेशजी के मन्त्र का स्मरण किया और श्रीगणेशजी के वरदायित्व का अनुभव किया। श्री गणेश के वर से सृष्टि के रचना का महान कार्य श्रीब्रह्माजी कर सके। त्रिपुरासुर का वध करने के लिये नारद जी के  उपदेशानुसार श्रीशंकरजी ने श्री गणेश जी की आराधना की तब भगवान श्रीगणेशजी ने प्रसन्न होकर श्री शंकर जी को,’श्री गणेश सहस्त्रनाम’ प्रदान किया और त्रिपुरासुर संहार में यश प्राप्ति का वर दिया। ऐसा है वरदमूर्ति श्रीगणेशजी का अमोघ और उदार वरदायित्व।
प्राचीन भारत में देवत्व की प्राप्ति जीवन का परम ध्येय था।गुरुकुल से लौटते हुए स्नातक को यह शिक्षा दी जाती थी। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्य देवो भव। अतिथि देवो भव।(तैत्तरीय उपनिषद) माता-पिता, आचार्य और अतिथि को देवता मानकर सेवा करो। सारांश यह है कि जीवन में देवता का प्राधान्य है। जहां देव भाव का अभाव है, वहां असुर भाव उपस्थित हो जाता है।
असुर भाव से त्राण पाने के लिये देवता की शरण लेने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। अतएव देवाराधन के द्वारा देवत्व की वृद्धि करके असुर भाव का विनाश करना जीवन का परम कर्तव्य है। मानव जीवन का परम लक्ष्य देवत्व की प्राप्ति है। और असुर भाव उसमें प्रधान और प्रबल विध्न है।श्रीगणेशजी विघ्नेश्वर हैं। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
Latest News

Pitru Paksha 2026: आज से पितृ पक्ष शुरू, जानिए पूजा का समय और नियम

Pitru Paksha 2026: आज से पितृपक्ष माह की शुरुआत हो रही है. पितृपक्ष का समय पितरों को अर्पित है....

More Articles Like This