Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, एक हजार चतुर्युगी का एक कल्प होता है, इसमें किसी न किसी त्रेता में प्रभु श्री राम का अवतार होता है। श्रीरामचरितमानस में चार कल्पों की कथा है। एक कल्प में अपने द्वारपाल जय-विजय के उद्धार के लिए भगवान अवतार लेते हैं। रमा बैकुण्ठ की बात है,सनकादिक भगवान का दर्शन करने जा रहे थे, जय-विजय ने उन्हें रोका, श्राप दे दिया।
सनकादिकों के शाप से जय विजय रावण कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लिये, उनके उद्धार के लिए भगवान ने अवतार लिया। एक कल्प में सती वृन्दा के शाप से भगवान का अवतार हुआ और वहां जालन्धर रावण बना है।
तहां जालन्धर रावण भयऊ।
रन हति राम परम पद दयऊ।।
एक कल्प में नारद मोह का प्रसंग सुनाया है। देवर्षि नारद के शाप से भगवान का अवतार हुआ और उस कल्प में नारद मोह के समय दो शिव गणों ने उनकी बहुत हंसी उड़ाई थी। नारद जी के शाप से वही रावण कुम्भकर्ण बने। इस कथा से शिक्षा मिलती है कि हम भले ही कितने बड़े हो लेकिन किसी की हंसी नहीं उड़ाना चाहिए, किसी के दिन अच्छे नहीं है तो उसे सम्हालना चाहिए। दूसरे की खराब परिस्थितियों पर हंसी उड़ाने वाला अच्छा नहीं होता।
श्री मनु शतरूपा ने नैमिषारण्य में तप किया, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्री सीताराम जी प्रकट हुये। मनु महाराज ने भगवान जैसा पुत्र मांगा, प्रभु श्री राम ने कहा मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं है। मैं स्वयं आपका पुत्र बनूंगा। वही मनु महाराज त्रेता में श्री दशरथ कौशल्या के रूप में जन्म लेते हैं और भगवान उनके यहां श्रीराम रूप में अवतार लेते हैं। इस कल्प में प्रताप भानु नाम का राजा ब्राह्मणों के श्राप से रावण बना और भगवान की लीला हुई।
त्रेता के चतुर्थ चरण में महाराज दशरथ के महल में प्रभु श्री राम का अवतार हुआ। प्रभु श्री राम चार रूपों में प्रकट हुए। श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। अयोध्या में भगवान का विशाल प्राकट्य उत्सव मनाया गया।सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।