भगवान केवल सच्ची भक्ति से होते हैं प्रसन्न: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, भक्त्या तुष्यति केवलम्। भगवान केवल शिष्टाचार देखते तो ब्याध के ऊपर भगवान की कृपा कभी न होती। श्री शिव पुराण में व्याध की कथा है। उसको जंगल में शिव जी की पिण्डी का दर्शन हुआ, बड़ा व्यथित हुआ। हे भगवान! आप यहां जंगल में विराज रहे हैं यहां आपको कौन जल अथवा भोग आदि लगाता होगा। उसने सोचा यह कार्य हम स्वयं करेंगे, शिष्टाचार का ज्ञान नहीं था।
इसलिए अंजलि में और मुंह में पानी भर के लाता था और शिवजी को चढ़ता था कुछ फल फूल चढ़ा देता था, उसी से भगवान शंकर उस पर प्रसन्न होकर दर्शन दिये और ब्याध का जीवन सफल हुआ। यदि भगवान कृपा करने में आयु देखते,तो यह कहा जाता है कि- भगवान को पाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। पहले ८० वर्ष के बूढ़े दादा बनो, फिर मिलेंगे भगवान। अगर भगवान आयु देखते तो ध्रुव जी को कभी न मिलते क्योंकि ध्रुव जी को तो ५ वर्ष की अवस्था में केवल ६ महीने की साधना से भगवान का दर्शन हो गया। भगवान का दर्शन करके ध्रुव कृतार्थ हो गये।
अगर भगवान विद्या देखते तो कहां जाता है कि- भगवान को पाना है तो पहले पी०एच०डी० करो, भगवान अनपढ़ को नहीं मिलते। अगर भगवान विद्या देखते तो गजेन्द्र को कभी न मिलते क्योंकि गजेन्द्र तो हाथी शरीर से था लेकिन ग्राह के द्वारा पीड़ित होकर जब उसने भगवान को पुकारा तो भगवान हरि अवतार ले करके गजेन्द्र की रक्षा किये।
अगर भगवान जाति देखते तो कहा जाता है कि सतोगुण सम्पन्न आचरण करके पहले ब्राह्मण बनो, फिर मिलेंगे भगवान।अगर भगवान जाति,वर्ण, कुल देखकर कृपा करते तो भगवान विदुर जी को कभी नहीं मिलते क्योंकि विदुर जी तो दासी पुत्र थे।अगर भगवान बल देख करके कृपा करते तब तो कहा जाता कि पहले बलवान बनो, फिर मिलेंगे भगवान। भगवान को पाना कोई कमजोर व्यक्ति का काम नहीं है। अगर भगवान केवल पौरुष देखते तो महाराज उग्रसेन के ऊपर भगवान की कृपा कभी न होती। महाराज उग्रसेन कंस से हारे हुए राजा थे, कंस ने उनका राज सिंहासन छीन लिया था और उन्हें कारागार में लम्बे समय तक बन्द करके रखा था, महाराज उग्रसेन की गणना दुर्बल राजा में हो गई थी। लेकिन कंस का उद्धार करके भगवान महाराज उग्रसेन को ही गादी पर विराजमान किये और श्री कृष्ण बलराम स्वयं हाथ में छड़ी लेकर के उनके छड़ीदार बन गये।
अगर भगवान रूप देखते तो कहा जाता कि पहले तपस्या करके सुन्दर बनो फिर मिलेंगे भगवान। भगवान कुरूप को नहीं मिलते, अगर ऐसा होता तो कुब्जा पर भगवान की कृपा कभी न होती। कुब्जा के तो कूबड़ निकला हुआ था। वह मथुरा में सबसे ज्यादा कुरूप थी। उसको देखना भी कोई नहीं चाहता था, उसने भगवान को चन्दन लगाया, भगवान के  स्पर्शमात्र से कुब्जा का कुबड़ गायब हो गया और वह सुरूप बन गयी। जब भगवान मथुरा पधारे तब भगवान ने कुब्जा से अपने माथे पर चन्दन लगवाकर कुब्जा के जीवन को कृतार्थ  किया।
अगर भगवान धन देखते तो कहा जाता कि पहले धनवान बनो। भगवान को पाना कोई निर्धन का काम नहीं है। अगर भगवान केवल धनवानों के ऊपर कृपा करते तो सुदामा जी को कभी नहीं मिलते।धर्मशास्त्र और संत कहते हैं कि- भगवान केवल भक्ति से रीझते हैं।
रामहि केवल प्रेम पिआरा। जानि लेहु जो जान निहारा।। मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किये योग जप ज्ञान विरागा।।
भगवान भागवत में जिस-जिस पर कृपा किये, केवल उसकी निष्काम भक्ति से रीझकर ही कृपा कीजिये। राजा बलि के लिये भगवान ने वामन अवतार लिया, बलि का जन्म तो दैत्य कुल में हुआ था लेकिन प्रभु चरणों का प्रेम भगवान को वामन रूप में प्रकट कर दिया। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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