श्रीमद्भागवत के 24 अवतारों का स्मरण दिलाता है दुखों से मुक्ति: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रारम्भ में शौनकादि ऋषियों  द्वारा छः प्रश्न किये गये।जिसके उत्तर में श्रीशुकदेवजी ने सम्पूर्ण भागवत सुना दिया। भगवान नारायण के चौबीस अवतारों की कथा ही श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा है। चौबीस अवतारों के नाम का सुबह-शाम, पूजा-पाठ के समय स्मरण करने से सम्पूर्ण भागवत के स्मरण का पुण्य फल मिलता है और जीवन के समस्त दुःखों से छुटकारा मिलता है। चौबीस अवतारों में सबसे पहले व्यास अवतार सुनाया। देवर्षि श्रीनारदजी की प्रेरणा से भगवान व्यास के द्वारा भागवत की रचना बताया। श्रीभागवतजी के मंत्रों से प्रभावित होकर श्रीशुकदेवजी ने भागवत का अध्ययन किया और वे पुनः वन चले गये। फिर राजा परीक्षित का जन्म बताया, राजा परीक्षित का राज्याभिषेक, दिग्विजय और कलियुग का निरग्रह बताया।
राजा परीक्षित ने कलियुग को पांच स्थान दिया। जहां जुआ खेला जाता है वहां रहना। जहां मद्यपान होता है वहां रहना। जहां दुरचार होता है, वहां रहना। जहां जीवों की हिंसा होती है, वहां रहना और बहुत याचना करने पर अनीति से अर्जित धन में भी कलियुग को वास दिया। भगवान व्यास कहते हैं महाराज परीक्षित इतने महान राजा थे कि- आज भी कलियुग इन्हीं पांच स्थानों पर निवास करता है। इन पांच दोषों से अगर कोई बच गया तो कलियुग के दोषों  से बच गया। परिवार के मुखिया, समाज के मुखिया को प्रयत्न पूर्वक इन दोषों से बचना चाहिए क्योंकि परिवार और समाज अपने मुखिया का ही अनुकरण करता है।
जरासन्ध वध के बाद भीम दादा भगवान के मना करने पर भी उसका एक मुकुट ले आए थे जो अनीति की सम्पत्ति से बना था। आज महाराज परीक्षित ने वही मुकुट अपने सिर पर धारण कर लिया, जिससे कलियुग उनके सिर पर बैठ गया। शमीक ऋषि ध्यान में बैठे थे राजा परीक्षित ने उनको नकली महात्मा समझकर अपमान किया। कलियुग का सबसे बड़ा दोष यही है कि वह अच्छे को अच्छा समझने नहीं देता और बुरे को अच्छा समझने के लिए मजबूर कर देता है।शमीक ऋषि के पुत्र और शिष्य श्रृंगी ने श्राप दिया कि आज के सातवें दिन 
तक्षक कटेगा और राजा की मृत्यु होगी।राजा परीक्षित भगवान के भक्त थे उन्होंने इसको भी भगवान की इच्छा ही माना। अपराध का दण्ड तुरन्त मिल जाना यह भगवान की बहुत बड़ी कृपा है। नहीं तो अगले जन्म में भोगना पड़ता। अपने पुत्र जन्मेजय को राज्य देकर महाराज परीक्षित शुकताल चले गये वहीं पर साधु संतों का आगमन और श्रीशुकदेवजी का आगमन होता है। जहां श्रीगंगाजी के तट पर भागवत का सबसे पहला और विशाल महोत्सव हुआ। कल की कथा में विदुर चरित, ध्रुवचरित, प्रहलाद चरित और वामन अवतार की कथा होगी।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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