Crude Oil Price: वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों और ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है. इसे लगभग पांच महीने का उच्च स्तर माना जा रहा है. वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 104 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है. बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं ने निवेशकों और तेल कारोबारियों की परेशानी बढ़ा दी है. खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर सामने आए बयानों और पश्चिम एशिया में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों से तेल बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है.
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान का बड़ा बयान
ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा अरेफ ने कहा है कि देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ईरान के पास होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण स्थापित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. उन्होंने कहा कि ईरान अपने मित्र देशों के लिए इस समुद्री मार्ग से सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित कर सकता है. साथ ही, मौजूदा हालात के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने कहा कि उसे इसकी कीमत चुकानी होगी. होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज सेबेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. यहां किसी भी तरह की अस्थिरता से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. इसी आशंका के चलते तेल कारोबारियों की नजर इस क्षेत्र में होने वाले घटनाक्रमों पर टिकी हुई है.
पश्चिम एशिया में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों से तेल बाजार पर दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के पीछे पश्चिम एशिया में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियां भी एक प्रमुख कारण हैं. रिपोर्टों के अनुसार, हूती विद्रोहियों ने यमन के एक सैन्य प्रशिक्षण शिविर पर हमला किया है. इसके अलावा, सऊदी अरब की ऊर्जा सुविधाओं, हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं. इन घटनाओं से यह आशंका बढ़ गई है कि यदि क्षेत्र में संघर्ष और तेज होता है, तो ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो सकती है. ऐसी स्थिति में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता प्रभावित होने और कीमतों में और तेजी आने का जोखिम बना रहेगा.
2026 में अब तक 80% बढ़े ब्रेंट क्रूड के दाम
ब्रेंट क्रूड की कीमतों में वर्ष 2026 के दौरान अब तक लगभग 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है. विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के साथ रूस-यूक्रेन युद्ध के लगातार बने रहने से ऊर्जा बाजार पर दबाव बना हुआ है. ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण निवेशक संभावित आपूर्ति जोखिमों को तेल की कीमतों में शामिल कर रहे हैं. इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को समर्थन मिल रहा है.
खाड़ी क्षेत्र से तेल आपूर्ति में सुधार के संकेत
एक ओर जहां भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर आपूर्ति को लेकर कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं. अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल की आपूर्ति युद्ध-पूर्व स्तर के लगभग 80 प्रतिशत तक वापस आ चुकी है. हालांकि, रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है. वहीं, इराक के तेल मंत्री ने बताया कि इस महीने देश का तेल निर्यात 34 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक हो चुका है. उनके मुताबिक, इराक का निर्यात अब युद्ध-पूर्व स्तर के करीब पहुंच रहा है. देश ने क्षेत्रीय मानकों की तुलना में आकर्षक छूट देकर अपने तेल निर्यात को बढ़ाने की रणनीति अपनाई है.
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार तेजी का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है. यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो ईंधन लागत और परिवहन खर्च बढ़ने से महंगाई पर दबाव पड़ सकता है.
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव महत्वपूर्ण है. कच्चे तेल के महंगे होने से आयात पर होने वाला खर्च बढ़ सकता है, जिसका असर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ने की आशंका रहती है. आने वाले दिनों में तेल बाजार की दिशा काफी हद तक पश्चिम एशिया की स्थिति, होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रमों और वैश्विक तेल आपूर्ति में होने वाले बदलावों पर निर्भर करेगी. यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है.