Middle East Crisis: मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव तेजी से बढ़ता दिख रहा है. ईरान ने साफ तौर पर अमेरिका के साथ सीधी बातचीत से इनकार कर दिया है. ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि किसी भी प्रकार के अप्रत्यक्ष संपर्क को औपचारिक बातचीत नहीं माना जाना चाहिए. साथ ही, अमेरिका समर्थित संघर्ष-विराम प्रस्ताव को भी खारिज करने के संकेत दिए गए हैं.
तेल की कीमतें 100 डॉलर पार
ईरान के इस फैसले के तुरंत बाद वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल देखने को मिली. Brent Crude की कीमत 1.21 प्रतिशत बढ़कर 103.46 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई, जबकि West Texas Intermediate 1.35 प्रतिशत उछलकर 91.54 डॉलर प्रति बैरल हो गया. यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का परिणाम मानी जा रही है.
पहले आई थी गिरावट, अब फिर उछाल
इससे पहले बुधवार को संघर्ष-विराम की उम्मीदों के चलते तेल की कीमतों में गिरावट देखी गई थी. लेकिन जैसे ही बातचीत की संभावनाएं कमजोर हुईं, बाजार में फिर तेजी लौट आई. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
भारत पर क्या होगा असर?
भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है. विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत के चालू खाता घाटे (CAD) को 0.3 से 0.5 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकती है. साथ ही, महंगाई यानी CPI में भी 20 से 30 आधार अंकों तक बढ़ोतरी संभव है.
होर्मुज जलमार्ग पर बड़ा फैसला
तनाव के बीच ईरान ने एक अहम घोषणा भी की है. Strait of Hormuz से गुजरने वाले जहाजों को लेकर ईरान ने नई नीति अपनाई है. भारत, रूस, चीन, पाकिस्तान और इराक के जहाजों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दी गई है.
किन देशों पर लगेगी रोक?
ईरान ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका, इजरायल और कुछ खाड़ी देशों से जुड़े जहाजों को इस जलमार्ग से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी. इससे वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति पर और दबाव बढ़ सकता है.
आगे क्या संकेत मिल रहे हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति में तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं. यदि तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल तेल बाजार ही नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा. भारत के लिए यह स्थिति खासतौर पर चुनौतीपूर्ण हो सकती है.
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