मत्स्य क्षेत्र में बड़ा बदलाव, 9.6 से बढ़कर 19.8 मिलियन टन हुआ मछली उत्पादन

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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PM-MKSSY Fisheries Insurance: भारत का मत्स्य क्षेत्र पिछले एक दशक में तेजी से विकसित हुआ है और देश की ब्लू इकोनॉमी का महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है. सरकार की ओर से सोमवार को जारी एक फैक्टशीट के मुताबिक, देश का कुल मछली उत्पादन वर्ष 2013-14 में 9.6 मिलियन टन था, जो बढ़कर वर्ष 2024-25 में 19.8 मिलियन टन पहुंच गया. इसी अवधि में अंतर्देशीय यानी इनलैंड मत्स्य उत्पादन भी 6.1 मिलियन टन से बढ़कर 14.74 मिलियन टन हो गया. उत्पादन में इस तेजी को बनाए रखने और मत्स्य किसानों को रोगों, बाढ़ तथा जलवायु संबंधी जोखिमों से बचाने के लिए वर्ष 2024 में प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (पीएम-एमकेएसएसवाई) शुरू की गई. इसके तहत बीमा पहल को किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा तंत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है.

एनएफडीपी के जरिए किसानों तक पहुंच रही सहायता

पीएम-एमकेएसएसवाई के तहत लाभ का वितरण नेशनल फिशरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म (एनएफडीपी) के माध्यम से किया जा रहा है. इसके जरिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी डीबीटी के माध्यम से सहायता राशि सीधे किसानों के बैंक खातों में पहुंचाई जाती है.

चार सरकारी बीमा कंपनियां दे रही हैं कवरेज

फिलहाल चार सरकारी बीमा कंपनियां इस योजना में शामिल हैं. इनमें ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (ओआईसीएल), एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (एआईसीएल), न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (एनआईएएल) और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (यूआईआईसी) शामिल हैं. ये कंपनियां झींगा, प्रॉन, ताजे पानी की मछलियों और ठंडे पानी की प्रजातियों के लिए बीमा कवरेज उपलब्ध करा रही हैं. सरकार निजी बीमा कंपनियों को भी इस व्यवस्था से जोड़ने की प्रक्रिया में है.

किसानों को बीमा प्रीमियम पर 40% तक प्रोत्साहन

पीएम-एमकेएसएसवाई का प्रमुख उद्देश्य जलीय कृषि बीमा को किसानों के लिए किफायती बनाना है. इसके तहत किसान एक फसल चक्र के लिए बीमा पॉलिसी खरीद सकते हैं और उन्हें डीबीटी के माध्यम से वित्तीय सहायता दी जाती है. पात्र लाभार्थियों को बीमा प्रीमियम का 40 प्रतिशत तक प्रोत्साहन दिया जाता है. तालाब आधारित जलीय कृषि में यह सहायता 25,000 रुपये प्रति हेक्टेयर तक सीमित है, जबकि अधिकतम चार हेक्टेयर क्षेत्र तक कुल 1 लाख रुपये की सहायता उपलब्ध है. एक हेक्टेयर से कम क्षेत्र वाले किसानों को भी अनुपातिक आधार पर लाभ दिया जाता है.

अब तक 316 आवेदन मिले

योजना के शुरुआती परिणामों के मुताबिक अब तक 316 आवेदन प्राप्त हुए हैं, जो कुल 730.61 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हैं. इनमें से 127 आवेदनों को मंजूरी देकर सहायता राशि वितरित की जा चुकी है. इससे 321.74 हेक्टेयर क्षेत्र में मत्स्य पालन करने वाले किसानों को लाभ मिला है और कुल 40.03 लाख रुपये का भुगतान किया गया है.

आधुनिक जलीय कृषि प्रणालियां भी योजना में शामिल

सरकार ने आधुनिक जलीय कृषि प्रणालियों को भी योजना में शामिल किया है. केज कल्चर, रिसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस), बायोफ्लॉक, रेसवे और अन्य उन्नत तकनीकों के लिए भी बीमा प्रीमियम पर 40 प्रतिशत सहायता दी जाती है. इस श्रेणी में अधिकतम सहायता 1 लाख रुपये है और पात्र इकाई का आकार 1,800 घन मीटर तक निर्धारित किया गया है. इसके अलावा अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और महिला लाभार्थियों को सामान्य श्रेणी की तुलना में अतिरिक्त 10 प्रतिशत प्रोत्साहन भी प्रदान किया जाता है.

नुकसान होने पर कैसे मिलेगा बीमा क्लेम?

फैक्टशीट के अनुसार, यदि बीमा से कवर किसी जोखिम की घटना होती है तो किसान को तुरंत बीमा कंपनी को इसकी सूचना देनी होती है. इसके बाद आवश्यक दस्तावेज जमा किए जाते हैं और बीमा कंपनी नुकसान का आकलन करने के लिए विशेषज्ञ नियुक्त करती है. आकलन रिपोर्ट के आधार पर दावे का निपटारा किया जाता है और भुगतान किया जाता है. पूरी प्रक्रिया के दौरान बीमा कंपनी अपने पोर्टल के माध्यम से नियमित स्थिति अपडेट भी उपलब्ध कराती है.

30 से 45 दिन में होगा दावा निपटान

दावा निपटाने के लिए समय सीमा भी निर्धारित की गई है. झींगा पालन से संबंधित मामलों में दावे का निपटारा 30 दिनों के भीतर किया जाना है, जबकि अन्य जलीय कृषि गतिविधियों के लिए यह अवधि 45 दिन निर्धारित की गई है. सरकार के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य केवल बीमा प्रीमियम पर सब्सिडी देना नहीं है, बल्कि देश में जलीय कृषि बीमा का एक मजबूत और आत्मनिर्भर बाजार विकसित करना भी है.

इसके लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, बीमा कंपनियों, किसानों और तकनीकी संस्थानों को मिलकर काम करना होगा. फैक्टशीट के अनुसार, पीएम-एमकेएसएसवाई के तहत की जा रही पहलें भविष्य में भारत के मत्स्य क्षेत्र को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाने के साथ-साथ देश की ब्लू इकोनॉमी को भी नई मजबूती देंगी.

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