India Credit Growth: भारत में सिस्टमैटिक क्रेडिट ग्रोथ 15 मार्च तक 13.8% दर्ज की गई है, जो यह दर्शाता है कि देश में कर्ज की मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है. रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में भी क्रेडिट ग्रोथ करीब 13.5% रहने का अनुमान है. इस बढ़त को लिक्विडिटी सपोर्ट और जीएसटी में कटौती के बाद बढ़ी उपभोग आधारित मांग से मजबूती मिल रही है. यह संकेत देता है कि अर्थव्यवस्था में खपत और निवेश दोनों ही मोर्चों पर गतिविधियां बनी हुई हैं, जिससे बैंकिंग सेक्टर को सहारा मिल रहा है.
क्रेडिट-टू-डिपॉजिट अनुपात में बढ़ोतरी
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों के पास अपने क्रेडिट-टू-डिपॉजिट (सीडी) अनुपात को और बढ़ाने की गुंजाइश बनी हुई है. वर्तमान में जमा वृद्धि 10.8% पर स्थिर है, जबकि क्रेडिट ग्रोथ तेज बनी हुई है. इसके चलते सीडी अनुपात बढ़कर 83% तक पहुंच गया है. यह स्तर दर्शाता है कि बैंक अपने जमा के मुकाबले ज्यादा ऋण दे रहे हैं, जिससे उनके लिए संतुलन बनाए रखना एक अहम चुनौती बन सकता है.
डिपॉजिट ग्रोथ कमजोर, फंड जुटाना चुनौतीपूर्ण
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि डिपॉजिट ग्रोथ अपेक्षाकृत कम रहने के कारण बैंकों के लिए सस्ती दरों पर फंड जुटाना मुश्किल हो रहा है. इसी वजह से यह उम्मीद जताई गई है कि सावधि जमा यानी एफडी पर ब्याज दरों में फिलहाल कोई बड़ी कटौती देखने को नहीं मिलेगी. बैंक अपने फंडिंग कॉस्ट को संतुलित रखने के लिए दरों को स्थिर रख सकते हैं.
आरबीआई के कदम से मिलेगा सपोर्ट
ब्रोकरेज फर्म के अनुसार, कैश रिजर्व रेशियो में कटौती और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा एलसीआर-एनएसएफआर ढांचे में दिए गए समर्थन से सीडी अनुपात के विस्तार को बढ़ावा मिलेगा. इसका सबसे ज्यादा फायदा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मिलने की संभावना जताई गई है, क्योंकि उनके पास पहले से ही बड़ा लोन बेस और सरकारी सपोर्ट होता है.
FY27 में भी मजबूत रहेगा ट्रेंड
रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 में भारत की क्रेडिट ग्रोथ करीब 13.5% रहने का अनुमान है, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ लगभग 11.5% रहने की उम्मीद है. यह अंतर बताता है कि आने वाले समय में भी बैंकिंग सेक्टर में लोन की मांग मजबूत बनी रह सकती है, लेकिन डिपॉजिट जुटाना एक चुनौती बना रहेगा.
मार्जिन सीमित, मिड-साइज बैंकों को फायदा
शुद्ध ब्याज मार्जिन के सीमित दायरे में रहने की उम्मीद जताई गई है. हालांकि, मध्यम आकार के बैंकों के मार्जिन में सुधार की संभावना ज्यादा बताई गई है. यह संकेत देता है कि छोटे और मिड-साइज बैंक इस दौर में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, खासकर अगर वे अपने लोन और डिपॉजिट के बीच संतुलन बनाए रखते हैं.
रेपो रेट कटौती का असर धीरे-धीरे दिखेगा
रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर 2025 में रेपो दर में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती का असर चौथी तिमाही में पूरी तरह दिखाई देगा. हालांकि, फंडिंग कॉस्ट अभी भी ऊंची बनी हुई है और अधिकांश बैंकों ने हालिया दर कटौती के बावजूद अपनी टर्म डिपॉजिट और सेविंग अकाउंट दरों में कमी नहीं की है. इसका मतलब है कि ब्याज दरों में राहत धीरे-धीरे मिलेगी.
एसेट क्वालिटी फिलहाल स्थिर
रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता फिलहाल स्थिर बनी हुई है. लेकिन मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष ने खासतौर पर लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए कुछ जोखिम पैदा कर दिए हैं. इन कंपनियों के लिए नकदी प्रवाह और इनपुट लागत से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं, जिससे आने वाले समय में इस सेक्टर पर दबाव देखने को मिल सकता है.
निजी बैंकों पर नजर रखने की जरूरत
निजी बैंकों के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यावसायिक ऋण और कमर्शियल व्हीकल जैसे सेक्टर्स पर नजर बनाए रखना जरूरी है. हालांकि, फिलहाल इसका प्रभाव सीमित नजर आ रहा है, लेकिन वैश्विक हालात को देखते हुए जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं.
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