Heart Failure Study: हार्ट फेलियर दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करने वाली गंभीर बीमारी है और अस्पताल में भर्ती होने की प्रमुख वजहों में से एक मानी जाती है. लंबे समय से इस बीमारी के इलाज में बीटा-ब्लॉकर (Beta-Blocker) दवाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है, लेकिन अब एक नई स्टडी ने इन दवाओं को लेकर अहम सवाल खड़े कर दिए हैं. शोध में संकेत मिले हैं कि हार्ट फेलियर के हर मरीज को इन दवाओं से समान फायदा नहीं मिलता. खासतौर पर एक विशेष प्रकार के हार्ट फेलियर वाले मरीजों में बीटा-ब्लॉकर से अस्पताल में भर्ती होने का खतरा बढ़ सकता है.
क्या होता है हार्ट फेलियर?
हार्ट फेलियर ऐसी स्थिति है, जब दिल शरीर की जरूरत के मुताबिक पर्याप्त मात्रा में खून पंप नहीं कर पाता. इसके कारण मरीज को सांस लेने में तकलीफ, जल्दी थकान, पैरों और टखनों में सूजन तथा रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार, हार्ट फेलियर हर मरीज में एक जैसा नहीं होता और इसके अलग-अलग प्रकार होते हैं.
हार्ट फेलियर के दो प्रमुख प्रकार
हार्ट फेलियर का पहला प्रकार हार्ट फेलियर विद रिड्यूस्ड इजेक्शन फ्रैक्शन (HFrEF) कहलाता है. इसमें दिल की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और पर्याप्त ताकत से खून पंप नहीं कर पातीं. इस स्थिति में बीटा-ब्लॉकर दवाओं को लंबे समय से प्रभावी इलाज माना जाता है. दूसरा प्रकार हार्ट फेलियर विद प्रिजर्व्ड इजेक्शन फ्रैक्शन (HFpEF) है, जो लगभग आधे मरीजों में देखा जाता है. इसमें दिल खून तो सामान्य मात्रा में पंप करता है, लेकिन उसकी मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और ठीक तरह से फैल नहीं पातीं. इसके कारण हर धड़कन के बीच दिल में पर्याप्त मात्रा में खून नहीं भर पाता.
क्यों की गई यह स्टडी?
कमजोर दिल वाले मरीजों में बीटा-ब्लॉकर के अच्छे परिणाम पहले ही सामने आ चुके हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि क्या यही दवाएं HFpEF वाले मरीजों के लिए भी उतनी ही फायदेमंद हैं. इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्मोंट के शोधकर्ताओं ने एक बड़ा अध्ययन किया. इस रिसर्च का नेतृत्व डॉ. टिमोथी प्लांटे ने किया और इसके नतीजे JAMA Network Open में प्रकाशित हुए.
स्टडी में क्या मिला?
शोधकर्ताओं ने TOPCAT Study के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जिसे अमेरिका के National Institutes of Health (NIH) का समर्थन प्राप्त था. इस अध्ययन में शामिल लगभग 80 प्रतिशत मरीज बीटा-ब्लॉकर दवाएं ले रहे थे, जिससे शोधकर्ताओं को दवा लेने और न लेने वाले मरीजों के स्वास्थ्य परिणामों की तुलना करने का अवसर मिला. विश्लेषण में पाया गया कि HFpEF यानी सख्त दिल वाले हार्ट फेलियर के मरीज जो बीटा-ब्लॉकर ले रहे थे, उनमें हार्ट फेलियर बिगड़ने के कारण अस्पताल में भर्ती होने का खतरा 74 प्रतिशत तक अधिक देखा गया.
क्या बीटा-ब्लॉकर सभी मरीजों के लिए नुकसानदायक हैं?
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि इस अध्ययन का मतलब यह नहीं है कि बीटा-ब्लॉकर हर मरीज के लिए नुकसानदायक हैं. अध्ययन केवल यह संकेत देता है कि जो दवाएं कमजोर दिल वाले मरीजों के लिए फायदेमंद साबित होती हैं, जरूरी नहीं कि वही दवाएं सख्त दिल वाले हार्ट फेलियर के मरीजों में भी समान लाभ दें.
इसके पीछे क्या हो सकती है वजह?
शोधकर्ताओं का मानना है कि HFpEF में दिल पहले से ही पर्याप्त रूप से रिलैक्स नहीं कर पाता. ऐसे में बीटा-ब्लॉकर दिल की धड़कन को धीमा कर देते हैं, जिससे कुछ मरीजों में दिल के भीतर दबाव बढ़ सकता है. इसके कारण शरीर में पानी जमा होना, सांस फूलना और सूजन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं, जिससे अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ सकती है.
दवा बंद करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूरी
विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि मरीज अपनी मर्जी से बीटा-ब्लॉकर दवाएं बंद न करें. कई मरीज इन दवाओं का इस्तेमाल हाई ब्लड प्रेशर, अनियमित दिल की धड़कन, हार्ट अटैक के बाद सुरक्षा और अन्य हृदय संबंधी समस्याओं के लिए भी करते हैं. इसलिए दवा में किसी भी तरह का बदलाव केवल डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए.
बेहतर इलाज की जरूरत पर दिया जोर
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन HFpEF यानी सख्त दिल वाले हार्ट फेलियर के मरीजों के लिए नए और अधिक प्रभावी इलाज विकसित करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है. साथ ही यह भी बताता है कि हर मरीज के लिए एक जैसा उपचार उपयुक्त नहीं हो सकता और इलाज मरीज की स्थिति के अनुसार तय किया जाना चाहिए.
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