Mobile Addiction Alert: फोन से दूर होते ही क्यों होती है बेचैनी? स्क्रीन टाइम बना रहा समय से पहले बूढ़ा

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Mobile Addiction Alert: आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन सिर्फ एक डिवाइस नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. सुबह उठते ही फोन देखना और रात को सोने से पहले आखिरी बार स्क्रीन पर नजर डालना अब आदत बन गई है. लेकिन क्या आपने कभी महसूस किया है कि अगर फोन कुछ समय के लिए भी दूर हो जाए, तो बेचैनी, घबराहट या खालीपन महसूस होने लगता है? कई लोग इसे सामान्य मानते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक गंभीर संकेत हो सकता है कि आपका दिमाग धीरे-धीरे स्क्रीन पर निर्भर होता जा रहा है.

हाल की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लोग 2024 के दौरान कुल 1.1 ट्रिलियन घंटे स्मार्टफोन पर बिता चुके हैं. इसका मतलब है कि औसतन हर व्यक्ति रोज करीब 5 घंटे स्क्रीन पर बिताता है. यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि डिजिटल डिवाइस का उपयोग अब जरूरत से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है.

स्क्रीन टाइम और शरीर पर उसका असर

लगातार बढ़ता स्क्रीन टाइम शरीर के अंदर कई तरह के बदलाव शुरू कर देता है. शुरुआत में यह बदलाव छोटे और नजरअंदाज करने लायक लगते हैं, लेकिन समय के साथ ये गंभीर समस्याओं का रूप ले लेते हैं. सबसे पहला और बड़ा असर नींद पर पड़ता है. रात में फोन या अन्य स्क्रीन का उपयोग करने से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर में बनने वाले मेलाटोनिन हार्मोन को दबा देती है. यही हार्मोन हमारी नींद को नियंत्रित करता है. जब मेलाटोनिन का स्तर कम होता है, तो नींद आने में दिक्कत होती है, नींद की गुणवत्ता खराब हो जाती है और व्यक्ति पूरी तरह आराम नहीं कर पाता.

नींद की कमी से बढ़ती समस्याएं

नींद की कमी सिर्फ थकान या सुस्ती तक सीमित नहीं रहती. यह शरीर और दिमाग दोनों को गहराई से प्रभावित करती है. रिसर्च में पाया गया है कि जो लोग देर रात तक स्क्रीन का उपयोग करते हैं, उनमें नींद की समस्या ज्यादा देखी जाती है. धीरे-धीरे यह स्थिति क्रॉनिक इंसोम्निया में बदल सकती है. नींद पूरी न होने की वजह से दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और ध्यान की कमी जैसी समस्याएं सामने आती हैं.

दिमाग पर पड़ रहा गहरा असर

नींद की कमी का सीधा असर दिमाग की कार्यक्षमता पर पड़ता है. वैज्ञानिक अध्ययनों में यह सामने आया है कि लगातार खराब नींद से दिमाग के वह हिस्से कमजोर होने लगते हैं, जो याददाश्त और निर्णय लेने की क्षमता से जुड़े होते हैं. इसका असर यह होता है कि व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होने लगती है, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत होती है और काम की उत्पादकता कम हो जाती है. 2024 की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नींद की समस्या अब डिमेंशिया जैसे गंभीर न्यूरोलॉजिकल रोगों के जोखिम को बढ़ाने वाले कारणों में शामिल हो रही है.

गट हेल्थ और मानसिक स्वास्थ्य का कनेक्शन

स्क्रीन टाइम और नींद की खराब आदतों का असर केवल दिमाग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शरीर के अंदर गहराई तक पहुंचता है. हाल की स्टडी के अनुसार, ज्यादा स्क्रीन टाइम और खराब नींद का सीधा असर गट माइक्रोबायोम पर पड़ता है. यानी हमारे पेट में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ने लगता है. गट हेल्थ खराब होने का असर सीधे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है. यही कारण है कि ऐसे लोगों में एंग्जायटी, स्ट्रेस और लो मूड जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ती हैं.

डोपामिन और डिजिटल लत का खेल

हर बार जब फोन पर कोई नोटिफिकेशन आता है, तो दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है. यह वही केमिकल है, जो हमें खुशी या संतुष्टि का एहसास कराता है. धीरे-धीरे दिमाग इस प्रक्रिया का आदी हो जाता है और बार-बार फोन चेक करने की आदत बन जाती है. यही आदत आगे चलकर लत का रूप ले लेती है. विशेषज्ञ इसे “डिजिटल ओबेसिटी” कहते हैं, जहां व्यक्ति स्क्रीन के बिना खुद को अधूरा महसूस करने लगता है.

एक्सपर्ट्स की चेतावनी

विशेषज्ञों के अनुसार, नींद, स्ट्रेस और गट हेल्थ एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं. इनमें से किसी एक में भी गड़बड़ी होने पर बाकी सिस्टम भी प्रभावित होने लगते हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि रात में आर्टिफिशियल लाइट के ज्यादा संपर्क में रहने से शरीर में सूजन बढ़ती है, जो दिमाग तक पहुंचकर न्यूरोइन्फ्लेमेशन पैदा कर सकती है. यह प्रक्रिया धीरे-धीरे उम्र बढ़ने की गति को तेज कर सकती है, जिससे व्यक्ति समय से पहले बूढ़ा दिखने लगता है.

कैसे बचें इस समस्या से

विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ छोटे-छोटे बदलाव अपनाकर इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

  • रात में सोने से कम से कम एक घंटे पहले फोन का इस्तेमाल बंद करें.
  • स्क्रीन टाइम को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश करें.
  • नोटिफिकेशन को सीमित रखें ताकि बार-बार ध्यान न भटके.
  • दिन में कुछ समय डिजिटल डिटॉक्स के लिए जरूर निकालें.

 

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