अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी जरूरी: जिम्मेदार नागरिक बनेंगे तो सुलझेंगी देश की समस्याएं

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

अशोक भगत
सचिव,
विकास भारती, झारखंड।

जिस तरह हम अपने अधिकारों की बातें करते हैं, उसी तरह हमें अपने कर्तव्यों के बारे में भी सोचना चाहिए. हमारी सभी समस्या का समाधान सरकार के पास नहीं है. सरकार हमें व्यवस्था खड़ी करके दे सकती है, पर उस व्यवस्था का प्रबंधन और संचालन हमें स्वयं करना होगा. कर्तव्यों को अधिकारों के ऊपर प्रतिष्ठित किये जाने से अनेक सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है. हम निरंतर अपने अधिकारों की बातें करते हैं और अपनी दुर्गति का सारा ठीकरा सरकार पर फोड़ देते हैं. पर आप सोचिए कि क्या सरकार हमारी सभी समस्याओं का समाधान कर सकती है? सरकार चाहे कितनी भी सफल क्यों न हो, हमारी सभी समस्याओं का समाधान उसके पास नहीं है.

व्यवस्था बनाम जिम्मेदारी

सरकार हमें व्यवस्था खड़ी करके दे सकती है, पर उस व्यवस्था का प्रबंधन और संचालन हमें स्वयं करना होगा. इतिहास बताता है कि अंग्रेजों के आने से पहले स्थानीय प्रशासन प्रबंधन में केंद्रीय सत्ता का हस्तक्षेप नहीं के बराबर था. हर जगह शासन की स्थानीय इकाई विकसित थी और वहीं शासन का स्थानीय प्रबंधन देखती थी. इस कारण लोगों के मन में शासन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण था. उन दिनों अधिकारों की बातें कम होती थीं और बड़े पैमाने पर लोगों में कर्तव्य की भावना विकसित थी. परंतु अंग्रेजों ने इसे बदल दिया. लोगों के मन में सरकार और सरकारी व्यवस्था के प्रति उदासीनता छाने लगी और वहीं से कर्तव्य के स्थान पर अधिकार की मांग होने लगी. स्वतंत्र भारत में भी प्रशासनिक ढांचे को बहुत ठीक नहीं किया गया.

संविधान में अधिकार और कर्तव्य

लोगों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय बोध विकसित करने के बदले अधिकार की भावना भड़कायी जाती रही. अधिकार और कर्तव्य की व्यवस्था भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों व मौलिक कर्तव्यों के रूप में व्याख्यायित है. मौलिक अधिकार हमारे संविधान में संविधान निर्माताओं द्वारा स्थापित किये गये हैं, जबकि मौलिक कर्तव्यों को संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया है. मौलिक अधिकारों के लागू होने के 26 वर्ष के उपरांत संविधान संशोधन द्वारा मौलिक कर्तव्यों के जोड़े जाने से जनमानस में स्वाभाविक रूप से अधिकारों के प्रति जागरूकता अधिक है और कर्तव्यों का भान कम दिखाई देता है. इस कारण प्रशासन, देश और समाज के प्रति एक नये प्रकार की उदासीनता विकसित हो गयी है.

कानून होने के बावजूद समस्याएं

इसे ठीक करना होगा. कर्तव्यों को अधिकारों के ऊपर प्रतिष्ठित किये जाने से अनेक सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है. उदाहरण के लिए, सरकार द्वारा कई कानून बनाये गये हैं, जैसे दहेज लेना और देना दोनों गैरकानूनी हैं, पर समाज में यह धड़ल्ले से चल रहा है. जातिगत टिप्पणी गैरकानूनी है, परंतु समाज में यह किसी न किसी रूप में जारी है. अपने घर की सफाई के साथ-साथ आस-पड़ोस की सफाई हमारा सामाजिक दायित्व है, परंतु सामाजिक बोध के अभाव में ज्यादातर लोग अपने घर का कूड़ा दूसरों के दरवाजे पर जमा कर देते हैं.

नागरिक जिम्मेदारी की कमी

यात्रा के समय सार्वजनिक यातायात के साधनों का उपयोग करते समय अधिकतर लोगों को सहयात्रियों का ख्याल नहीं रहता. यातायात नियम तोड़ने को अधिकतर लोग अपनी शान समझते हैं, सार्वजनिक स्थलों की सफाई का हमें ध्यान तक नहीं रहता है. इसी प्रकार, राष्ट्रीय हित की ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनकी अधिकतर नागरिक अवहेलना करते हैं. कई व्यक्तियों को इस मामले की जानकारी नहीं होती है, जबकि कई जिम्मेदार लोग भी इन्हें नजरअंदाज करते देखे जा सकते हैं. इन पूरे मामलों को हम आंकड़ों से समझने का प्रयास करते हैं.

आंकड़े बताते हैं गंभीर स्थिति

परिवहन मंत्रालय द्वारा 2025 में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में हेलमेट नहीं पहनने के कारण प्रतिदिन लगभग 80 लोगों की मृत्यु हो जाती है. सड़क दुर्घटनाओं पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में देश में हिट एंड रन की करीब 67 हजार दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 30 हजार से अधिक लोगों की जान गई. गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में प्रतिदिन 18 से 20 महिलाओं को दहेज के कारण अपनी जान गंवानी पड़ती है. अतिसार, हैजा, टाइफायड, हेपेटाइटिस, पोलियो, आंतों के कीड़े, ट्रेकोमा, पेचिश, सिस्टोसोमियासिस आदि ऐसी बीमारियां हैं, जो केवल गंदगी के कारण पनपती हैं. यदि हम सामाजिक दायित्व के तहत सामूहिक रूप से इसके खिलाफ अभियान चलाएं, तो इसे नियंत्रित किया जा सकता है.

राष्ट्रीय दायित्व भी उतने ही महत्वपूर्ण

जिस प्रकार हमारे सामाजिक दायित्व हैं, उसी प्रकार हमारे राष्ट्रीय दायित्व भी हैं. जैसे युद्ध, महामारी, प्राकृतिक आपदा या राष्ट्रीय संकट के समय एकता का परिचय देना. सीमा की सुरक्षा के लिए सुरक्षा बलों का सहयोग करना, आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों का साथ देना, लोगों में राष्ट्रीय भावना का संचार करना. क्षेत्रीयता, सांप्रदायिकता और भाषावाद जैसी विसंगतियों के प्रति समाज को सचेत करते रहना भी नागरिक कर्तव्य है. यह केवल सरकार के स्तर पर संभव नहीं है, इसके लिए आम नागरिकों को भी आगे आना होगा.

सामूहिक प्रयास ही समाधान

हमें समझना होगा कि सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वहन तभी संभव है जब हमारे भीतर संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित हो. सरकार प्रयास अवश्य करती है, लेकिन उसे जनसहयोग की आवश्यकता होती है. यदि हम सामूहिक रूप से प्रयास करें, तो बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना किया जा सकता है. कोरोना महामारी इसका उदाहरण है, जब कठिन परिस्थितियों के बावजूद लोगों ने एकजुट होकर संकट पर विजय पाने का प्रयास किया. आगे भी एक जागरूक नागरिक के रूप में हमें अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी समान रूप से पालन करते रहना चाहिए.

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