आजादी से 5 साल पहले ही फहरा दिया था तिरंगा, जानें कर्नाटक के इस बागी गांव की कहानी

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Esuru Independence History: भारत की आजादी की कहानी सिर्फ बड़े आंदोलनों और महान नेताओं तक सीमित नहीं है. देश के छोटे-छोटे गांवों में भी ऐसे साहसिक विद्रोह हुए, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नींव को चुनौती दी. कर्नाटक के शिवमोग्गा (Shimoga) जिले का एसुरु (Esuru/Issuru) गांव इसी जज्बे की एक ऐसी मिसाल है, जहां 1942 में ग्रामीणों ने ब्रिटिश शासन को खुले तौर पर चुनौती देते हुए खुद को आजाद घोषित कर दिया था. खास बात यह है कि यह घटना देश की आधिकारिक आजादी से करीब पांच साल पहले हुई थी.

एसुरु के ग्रामीणों ने न सिर्फ अंग्रेजों को टैक्स देने से इनकार किया, बल्कि गांव में तिरंगा फहराकर ‘स्वराज सरकार’ की स्थापना भी की. अंग्रेजी हुकूमत ने इस विद्रोह को दबाने के लिए कड़ा दमन किया. कई लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, जबकि विद्रोह से जुड़े पांच प्रमुख युवाओं को बाद में फांसी की सजा दी गई.

भारत छोड़ो आंदोलन की गूंज पहुंची एसुरु तक

साल 1942 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान किया था. इस आंदोलन की गूंज देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंची. एसुरु के ग्रामीणों ने भी इस आह्वान को अपने तरीके से आगे बढ़ाया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया. गांव के लोगों ने एकजुट होकर अंग्रेजों को किसी भी तरह का टैक्स देने से साफ इनकार कर दिया. इसके साथ ही उन्होंने ब्रिटिश शासन के आदेशों को मानने से भी इनकार कर दिया. ग्रामीणों का यह कदम सीधे तौर पर अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाला था.

29 सितंबर 1942 को फहराया गया तिरंगा

एसुरु के इतिहास में 29 सितंबर 1942 का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इसी दिन गांव के लोगों ने गांव के बीचों-बीच भारत का तिरंगा फहराया. इसके साथ ही गांव के प्रवेश द्वार पर ‘स्वराज सरकार’ का बोर्ड लगा दिया गया. ग्रामीणों ने अपनी एक स्थानीय सरकार का गठन किया और यह संदेश दे दिया कि एसुरु में अब ब्रिटिश हुकूमत का कानून नहीं चलेगा. इस तरह गांव के लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अपनी स्वतंत्र सत्ता की घोषणा कर दी.

अंग्रेजों ने किया दमन, पांच युवाओं को दी गई फांसी

एसुरु के ग्रामीणों का यह विद्रोह अंग्रेज सरकार के लिए सीधी चुनौती था. जब ब्रिटिश अधिकारियों ने गांव पर दोबारा नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की, तो स्थिति हिंसक झड़प में बदल गई. इस दौरान एक अंग्रेज राजस्व अधिकारी की मौत हो गई. इसके बाद ब्रिटिश सेना ने एसुरु में कड़ी कार्रवाई की. गांव पर हमला किया गया और बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. अंग्रेजी हुकूमत ने विद्रोह को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाए.

आखिरकार 8 मार्च 1943 को इस विद्रोह से जुड़े पांच प्रमुख युवाओं को फांसी की सजा दे दी गई. हालांकि, अंग्रेजों की इस कार्रवाई के बावजूद एसुरु के ग्रामीणों का साहस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दर्ज हो गया. एसुरु की कहानी यह याद दिलाती है कि भारत की आजादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों और प्रमुख आंदोलनों तक सीमित नहीं थी. देश के दूर-दराज के गांवों के लोगों ने भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई और जरूरत पड़ने पर अपने प्राणों तक का बलिदान दिया.

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