Reporter
The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, स्वभाव को सुधारो! नम्रता और नाम-स्मरण से स्वभाव सुधरता है। स्वाध्याय जीवन में आवश्यक है। हमारे-आपके जीवन में तीन आध्यात्मिक साधन अति आवश्यक हैं- नाम स्मरण, स्वाध्याय एवं सत्संग। प्रभु के नाम का स्मरण करना प्रत्येक साधक के लिए अति आवश्यक है।
दूसरा साधन नित्य स्वाध्याय होना आवश्यक है। स्वाध्याय का संत महापुरुषों ने दो अर्थ किया है- पहला अर्थ किया है धर्म-ग्रंथों का पठन-पाठन और दूसरा अर्थ किया स्वयं के जीवन का चिंतन। हमारे जीवन में क्या-क्या आवश्यक है? हमारे जीवन का स्तर क्या है? पहले से कुछ सुधार आया कि नहीं? अगर बिल्कुल सुधार नहीं है तो यह चिन्ता का विषय है.
कल्याण के साधन में तीसरी बात है सत्संग। सत्संग से बहुत कुछ नया प्राप्त होता है, जहां तक हमें पहुंचना है। बहुत कुछ ज्ञान सत्संग से प्राप्त होता है और हमारा नाम-स्मरण या स्वाध्याय सही चल रहा है या नहीं, इसका बोध भी सत्संग से ही होता है। आज से मैं प्रभु का बन रहा हूं, ऐसी भावना करो। शक्ति और बुद्धि के सदुपयोग से पैसा तो ठीक, परमात्मा भी प्राप्त हो जाते हैं।
स्वाध्याय एवं सत्संग से ही स्वभाव सुधरता है। जिसका स्वभाव सुधरता है, उसका संसार भी सुधरता है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।