Islamabad: दो दिन पहले पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने एक संयुक्त रक्षा समझौते पर दस्तखत किए. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्की राष्ट्रपति रेजेप तैयप एर्दोगान ने अल-सफा पैलेस में इस मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए. लेकिन पाकिस्तान के अंदर ही इसे लेकर आवाज उठने लगी है. लोगों को कहना है कि बिना संसद और अवाम की जानकारी के ही इतना बड़ा फैसला ले लिया गया.
प्रावधान नाटो के आर्टिकल-5 जैसा
समझौते का मूल प्रावधान नाटो के आर्टिकल-5 जैसा है. सीधे शब्दों में अगर एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो ये तीनों पर हमला माना जाएगा. यह सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और रक्षा सहयोग के सभी पहलुओं को मजबूत करने का दावा करता है. इस समझौते को कई लोग इस्लामिक नाटो कहने लगे हैं. पाकिस्तान एकमात्र परमाणु शक्ति वाला मुस्लिम देश है, सऊदी अरब इस्लाम के पवित्र स्थलों का संरक्षक और प्रमुख तेल निर्यातक है, जबकि तुर्की नाटो का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य बल रखने वाला देश है.
इस्लामिक भावना से जोड़ने की कोशिश
मक्का में इस पर दस्तखत करने के साथ ही इसे इस्लामिक भावना से जोड़ने की कोशिश की गई है. पाकिस्तान में राजनीतिक दल और कई विश्लेषक इसे ऐतिहासिक बता रहे हैं. बिलावल भुट्टो जरदारी, यूसुफ रजा गिलानी, मुशाहिद हुसैन सैयद और अन्य नेताओं ने स्वागत किया. सूचना मंत्री अताउल्लाह तारर ने इसे ऐतिहासिक दिन करार दिया और ओआईसी ने भी समर्थन जताया. बावजूद इसके समझौते पर सवाल भी उठ रहे हैं. कुछ विश्लेषक पूछ रहे हैं कि क्या यह वास्तव में ‘इस्लामिक नाटो’ बनेगा या सिर्फ कागजी समझौता रहेगा?
नाटो होने से संचालन मुश्किल
इसकी सबसे बड़ी वजह सैन्य उपकरण अलग-अलग देशों के मानक– अमेरिकी, चीनी, नाटो होने से संचालन मुश्किल है. संयुक्त कमांड, साझा मुख्यालय या पूर्व-निर्धारित बल तैनाती जैसी व्यवस्था पर भी अभी कोई स्पष्टता नहीं है. पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका खासकर अमेरिका-ईरान युद्ध में प्रभावित हो सकती है. भारत और इजरायल जैसे देशों से संबंधित खतरों को लेकर घरेलू बयानबाजी और क्षेत्रीय वास्तविकता में भी अंतर है और यह प्वाइंट भी रखा जा रहा है.
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