स्नान से तन, ध्यान से मन और दान से धन की होती है शुद्धि: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, कथा सुनने के बाद जीवन में परिवर्तन होना चाहिए। यह शरीर मेरा नहीं तो फिर यह धन मेरा कैसे हो सकता है? अधिकतर लोग दुःखी हैं, क्योंकि लोग भगवान को भूल गए हैं। उनके उपकारों को भूल गए हैं। प्रभु का दास कभी उदास नहीं होता। साधु का समय बहुत ही मूल्यवान होता है।
स्नान से तन की शुद्धि, ध्यान से मन की शुद्धि और दान से धन की शुद्धि होती है। बाहर से कोई मिलने के लिए जब घर में आता है तो हम घर के सभी दरवाजे खोलकर उसे पूरा घर बताते हैं, परन्तु तिजोरी का दरवाजा खोलकर रुपया, सोना, धन-दौलत आदि गुप्त वस्तुएँ उसे नहीं बताते। ये वस्तुयें तो पत्नी या पुत्र को बताने के लिए ही होती हैं।
इसी तरह जीव का जब तक प्रभु से प्रेम पूर्वक सम्बन्ध नहीं हो जाता, तब तक प्रभु का पूर्ण स्वरूप नहीं जान सकता और उस समय तक प्रभु का पूर्ण रूप भी माया के परदे के पीछे छिपा रहता है। जिस पर हमारा अतिशय प्रेम होता है उसी को हम चाबी सौंपते हैं। उसी प्रकार जो जीव प्रेम से प्रभु का हो जाता है, उसी के समक्ष प्रभु का पूर्ण रूप प्रकट होता है।
जीव जब प्रभु के साथ अतिशय प्रेम करता है, तभी माया का पर्दा फटता है।सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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