Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, श्रीशिवमहापुराण समर्पण योग सीखने के लिए है। श्रीशिवमहापुराण कहता है कि जो कुछ तुम्हारा है, उसे प्रभु के चरणों में अर्पित कर दो एवं बाद में विवेक से उसका उपयोग करो।
गले में कंठी डालने के पीछे जीव का यह भाव होना चाहिए कि यह शरीर मैं शिवार्पण करता हूँ। शिव प्रसन्न रहें, इसी रीति से मैं शरीर का उपयोग करूँगा। ऐसे समर्पण भाव से जीव भगवान का बन जाता है और निर्भयता पूर्वक काल को भगा सकता है।
काल का डर तो देवताओं को भी लगता है, किन्तु जीव समर्पण भाव से जैसे ही ईश्वर के साथ प्रीति बाँध लेता है, वैसे ही काल का भय समाप्त हो जाता है। हम प्रभु के बालक हैं और हमारे पिता सर्वश्रेष्ठ हैं इस भाव से भगवद्मय जीवन जीने वाले व्यक्ति संदेह रहित होकर जी सकते हैं।
जिस तरह धन प्राप्त करने के लिए पसीना बहाते हो, इसी तरह परमात्मा को प्राप्त करने के लिए भी पसीना बहाओ। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।