Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, श्री शिव महापुराण में भगवान व्यास कहते हैं – श्री शिव को हम नमस्कार करते हैं। केवल शिव को नहीं बल्कि श्री शिव को। श्री अर्थात् भगवती पार्वती वाले शिव को हम नमस्कार करते हैं। जो भगवान की अनुरागात्मिका शक्ति है, भक्ति हैं, जिनसे वे सगुण है। संसार केवल उन्हीं को भजता है जिनमें कोई गुण हो। भगवान् शिव को गुणवान बनाने वाली भगवती श्री पार्वती जी ही हैं। वे भगवती श्री हिमाचल राज की पुत्री है।
जो निर्गुण को सगुण बना देती है। अतः हम सब भी ऐसे गुण वाले श्री शिव को नमस्कार करते हैं। नमस्कार, प्रणाम, वंदन आदि श्री शिव महापुराण में शब्द हैं। किन्तु इन तीनों के भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं, अलग-अलग भाव हैं। श्री शिव महापुराण भगवान शिव पार्वती की वांग्मायी अर्थात् शब्दमयी मूर्ति है। इसके मूर्तिकार भगवान श्री कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी महाराज हैं।
श्री शिव महापुराण रूपी शब्दमयी मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा नहीं करवाना पड़ा, स्वयं भगवान शिव भगवती पार्वती सपरिकर विराजमान हो गये। श्रीशिवमहापुराण को प्रणाम, पूजन, परिक्रमा करने से साक्षात् भगवान के पूजन परिक्रमा का पुण्य फल मिलता है। श्री शिव महापुराण सुनने से साक्षात् भगवान शिव को सुनने का पुण्य फल मिलता है। श्री शिव महापुराण सुनने से भक्तों को भगवान शिव के अभिषेक, पूजन और भक्ति का फल प्राप्त होता है।अनेक जन्मों का पुण्य जब उदित होता है तब श्री शिव महापुराण की कथा सुनने का अवसर प्राप्त होता है।
कलियुग के जीवों के मंगल के लिए शिव पुराण भगवान शंकर ने गाया। ये समस्त पुराणों का तिलक है।जिसे शिव की भक्ति और प्रसन्नता चाहिए वे शिव पुराण अवश्य सुने। शिव पुराण सुनने से भक्ति,ज्ञान वैराग्य की प्राप्ति होती है। शिव पुराण सुनने गाने से अन्त में शिव की प्राप्ति अवश्य होती है।
शिव पुराण सुनने से ज्ञाताज्ञात पाप नष्ट हो जाते हैं। धर्म,अर्थ, काम,मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति शिव पुराण सुनता है वो संसार के सभी सुख भोगने के अन्त में परमधाम को प्राप्त करता है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।