Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, श्री शिव महापुराण में कथा आती है कि देवर्षि श्री नारद जी भगवान के परम भक्त हैं। भगवान के दास हैं। वे उदास कभी नहीं रहते। भगवान का दास होकर उदास रहे तो फिर भक्ति और विश्वास कहां? भक्तिमार्ग की रीति है कि जो प्रभु का हो गया उसके लिये चिन्ता करना दोष है। भक्तिमार्गी को चिन्तन करना चाहिए, चिन्ता नहीं करना चाहिए ।संतों ने अपनी वाणी में कहा है कि-
चिन्ता तो हरि नाम की और न चिन्ता दास।
जो कछु चितवे राम बिनु सोई काल के पास।।
चिन्ता तो चिता के समान है। चिता तो मुर्दे को जलाती है लेकिन चिन्ता तो जिन्दों को जला देती है। भगवान का दास सदैव आनन्द में रहता है। और वह कभी उदास नहीं होता, कभी उग्र नहीं होता,कभी व्यग्र नहीं होता, वह शान्त रहता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने संयम को नहीं खोता। ऐसे शान्त महापुरुष का संग हम सबको शान्ति देता है। जिसके पास बैठने मात्र से शान्ति का अनुभव हो, व्यग्रता, उग्रता सब समाप्त हो जाय, वही सच्चा संत होता है। उसके दास के दास हम सब बनें।
पहली और आखिरी बात- सबसे पहली और सबसे आखरी बात तो एक ही है- एक भी क्षण हमारे जीवन का प्रभु की पवित्र तथा मधुर – मधुर स्मृति से रहित नहीं बीतना चाहिए। भगवान की यह वाणी सदैव याद रहे- तस्मात् सर्वेषु कलेशु मामनुस्मर।
असली फल वह है जो अन्तिम परिणाम के रूप में प्राप्त होता है। चापलूसी या पाप करने वाला मनुष्य यदि एक बार बढ़ते हुए दीखता है तो इसका मतलब यह नहीं की यही अन्तिम परिणाम है। घर में आग लगने पर भी एक बार रोशनी दीख सकती है, पर घर खाक हो जाता है।
असल में सत्य और पुण्यकर्म का फल ही वास्तविक शान्तिदायक और सुखदायक हो सकता है। इस पर विश्वास करके शुद्ध आचरण में लगे रहना चाहिये। किसी आकस्मिक उन्नति में लुभाकर पाप में प्रवृत्ति उचित नहीं है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।