Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, जिसे पाप का डर नहीं, उसे मन की शान्ति नहीं मिलती। अति पापी और प्रेत दोनों एक जैसे हैं। भोजन करते समय जूंठा छोड़ना सबसे बड़ा पाप है। अन्न ब्रह्मरूप है। उसको नहीं बिगाड़ना चाहिए। संग्रह और परिग्रह में लगे हुए का नाम ही जरासंध है।
रजोगुण ही काम और क्रोध का पिता है। पाप के बाप का नाम लोभ है। प्रत्येक इन्द्रिय से भक्ति करो, पाप से बचे रहोगे। निश्चय करो- आज से मुझे कोई भी पाप नहीं करना है। वक्ता या श्रोता की तन्मयता में विक्षेप पैदा करने वालों को बहुत पाप लगता है। पाप से सावधान रहो, पाप से बचते रहो।
लोग थोड़े से सुख के लिए पाप की कितनी गठरी उठाते हैं? पैसा और कामसुख, इन दोनों के लिए ही मनुष्य पाप करता है। पाप करो या नहीं, पैसा तो प्रारब्ध के अनुसार ही मिलेगा। फिर व्यर्थ ही पाप का बोझ क्यों उठाया जाए? मनुष्य को यदि सच्चे सुख का पता लगे तो वह झूठे सुखों के लिए पाप ही न करे। काम और दाम के लिए ही सब पाप होते हैं। आज से निश्चय करो कि आज से पाप नहीं करेंगे। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।