बालक जन्म से नहीं, संस्कारों से बनता है महान– दिव्य मोरारी बापू

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, प्रभु श्रीराम का चार रूप में अवतार हुआ श्रीराम,लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न। भारतीय संस्कृति में १६ संस्कार बताये गये हैं। बालक का संयोग होना भी एक संस्कार के रूप में माना गया है।जब गर्भ में सातवां महीना होता है तब भी एक पूजा होती है। जन्म के बाद सबसे पहला जातकर्म संस्कार होता है जिसमें पितृ देवताओं की पूजा होती है। प्रभु श्री राम का जातकर्म संस्कार हुआ।
नंदी मुख श्राद्ध करि जातकर्म सब कीन्ह।
हाटक धेनू वसन मनि नृप विप्रन्ह कहं दीन्ह।।
भगवान के जातकर्म संस्कार के अवसर पर महाराज दशरथ ने बहुत धन लुटाया। महाराज दशरथ बहुत उदार हैं, उदार व्यक्ति कोई भी कार्य बढ़ चढ़कर ही करता। दूसरे संत कहते हैं- संसार का धन इतना महत्वपूर्ण नहीं है। प्रभु का स्मरण ही सबसे बड़ा धन है।महराज दशरथ को परमात्मा मिल गये, पुत्र के रूप में, इसलिए उन्होंने अपना सब कुछ लुटा दिया।
एक संत कहते हैं- जिसके प्रति हमारा प्रेम होता है, उसके लिये अपना सर्वस्व लुटाने में जोर नहीं आता। जिसमें हमारा प्रेम नहीं है, उसके लिये थोड़ा सा करने में भी जोर आता है। माता-पिता का बच्चों के प्रति प्रेम होता है इसलिए वे बच्चों के लिये सब कुछ करने को तैयार हो जाते हैं और दरवाजे पर जब कोई याचक आता है, तो थोड़ा सा करने में भी उन्हें जोर आता है।
चारों भाइयों का नामकरण संस्कार गुरु वशिष्ठ ने किया। महाराज के ज्येष्ठ पुत्र का नाम राम रखा। राम शब्द का अर्थ होता है जो सबको आराम देने वाला है, वही राम है। राम तत्व अति विशिष्ट है। परमात्मा का नाम साधन भी है और साध्य भी है। यही जीवन का आखिरी प्रातव्य भी है। नामकरण संस्कार के बाद गृह निष्क्रमण संस्कार किया गया। इसमें बालक को पहली बार घर से बाहर निकाल कर सूर्य नारायण भगवान का दर्शन कराया जाता है।
इसके बाद प्रभु का अन्नप्राशन संस्कार होता है। अन्नप्राशन संस्कार जब बालक ६ महीने का हो जाय तब किया जाता है। उसे पहली बार भगवान का प्रसाद जो अन्न हो खिलाया जाता है। अपने धर्मशास्त्रों में १६ संस्कार बताये गये हैं। पूज्य गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज श्री रामचरितमानस में उन सभी संस्कारों का क्या वास्तविक रूप है, उसका वर्णन करते हैं। बालक जन्मजात महान नहीं होता, माता-पिता के द्वारा दिये गये दिव्य संस्कारों से महान बनता है।
बंदउ प्रथम गुरू पितु माता।
जो एहि नर तन केरि विधाता।।
नन्हा सा बच्चा माता-पिता, परिवार, समाज आगे चलकर शिक्षण संस्थाओं और धार्मिक संस्थाओं से संस्कार प्राप्त करता है। सबको मिलकर ऐसा वातावरण देना चाहिए कि हमारे बच्चों में अच्छे संस्कार आये। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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