Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, मैं तुच्छ नहीं हूँ। मैं तो शुद्ध चैतन्यमय परमात्मा का अंश हूँ। मन की मजबूती के लिए बड़ी औषधि मंत्र जाप है। प्रभु पदार्थ से नहीं, प्रणाम से प्रसन्न होते हैं।वंदन में हृदय के भावों का संगम हो, तभी वह सार्थक होता है। प्रभु को हमेशा साथ में रखोगे तभी जीवन सफल बनेगा। किसी भी प्रकार का सत्कर्म किए बिना जो खाता है, वह पाप को ही खाता है।
उत्तरा के गर्भ का नाश करने के लिए अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा। उत्तरा प्रभु के शरण में आई और प्रभु ने सुदर्शन से ब्रह्मास्त्र का निवारण किया। इस तरह प्रभु ने परीक्षित की गर्भ में रक्षा की। हम सब परीक्षित ही हैं। हम सबकी रक्षा भी परमात्मा ही करते हैं। बालक की रक्षा माँ-बाप नहीं, बल्कि भगवान करते हैं। बीमार की रक्षा डॉक्टर नहीं, बल्कि ईश्वर करते हैं।
डॉक्टर में यदि बीमार की रक्षा करने की शक्ति होती तो स्वयं उसकी ही अर्थी क्यों निकलती। इसलिए मनुष्य में तो किसी की रक्षा करने की शक्ति है ही नहीं। वह तो स्वयं ही काल का ग्रास है, फिर दूसरों को वह क्या बचाएगा। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।