प्रभु का नित्य स्मरण ही हमारे जीवन की है संपत्ति: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, वंदन अर्थात् विश्वासघात न करने की प्रतिज्ञा। प्रणाम का अर्थ है प्रामाणिकता का प्रतिज्ञापत्र। प्रणाम करते हो तो यह प्रतिज्ञा भी कर रहे हो कि जीवन में कभी भी अप्रामाणिक नहीं बनेंगे। नमस्कार करो तो इस भाव से कि हे नाथ ! मैं कभी भी नमकहराम नहीं बनूंगा, सदैव आपके प्रति वफादार रहूंगा।
श्री रामचरितमानस बालकाण्ड के मंगलाचरण में गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने राम जी को वंदन, श्री सीता जी को नमस्कार और श्री हनुमान जी को प्रणाम करते हैं। गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज की कामना मारुतिनंदन श्री हनुमान जी के समाने प्रामाणिक सेवक बनने की है। सीता मां से कामना करते हैं कि मैं आपका पुत्र हूं, आपने मेरा पालन पोषण किया, मुझे बड़ा किया, मेरे दुर्गुणों को मिटाया, हे मां! मैं आपके चरणों में नमस्कार कर रहा हूं! प्रभु के प्रति वंदन में भाव यह है कि मैं आपका वफादार सेवक बनूं , कभी विश्वासघात नहीं करूंगा। 
आगे भाव विभोर होकर कहते हैं – जाऊं कहां तजि चरण तुम्हारे। अद्भुत वफादारी है ? ऐसे ही प्यारे नंदनंदन प्रभु को वंदन करें और पूर्ण भाव से कहें कि हे प्रभु, आप ही हम सबके जीवन हैं, आपको छोड़कर हम सब कहां जायें? आपका एक पल भी भूलना हम सबके जीवन की विपत्ति ही होगी। आपका नित्य स्मरण ही हमारे जीवन की संपत्ति है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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