Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, प्रभु श्री राम की बाल लीलाओं में प्रसिद्ध बाल लीला है। जब प्रभु श्री राम बहुत छोटे थे, मां ने दूध पिलाकर उनको पालने में सुला दिया। अयोध्या के कुल देवता श्री रंगनाथ भगवान हैं। जिनकी पूजा के लिए मां ने दुबारा स्नान किया। श्री रंगनाथ भगवान का पूजन किया, कुछ नैवेद्य भोग लगाया, मां रसोई घर में देखने गई की कोई प्रसाद छूट तो नहीं गया, जो भगवान के थाल में न आया हो और वापस जब मां मंदिर में पहुंची तो देखा नन्हे से रामलला श्री रंगनाथ भगवान के विग्रह के पास विराजमान होकर प्रसाद आरोग रहे हैं।
मां ने सोचा रामलला यहां कैसे आ गये। पालने में जाकर देखा तो प्रभु श्री राम सोये हुये हैं और पुनः मंदिर जाकर देखा तो प्रसाद आरोग रहे हैं। मां बहुत आश्चर्यचकित हो जाती है, तब भगवान ने मां कौशल्या को अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराया। जहां भगवान के एक-एक रोम में करोड़ों करोड़ ब्रह्मांड निवास कर रहे हैं।
देखरावा मातहिं निज अद्भुत रूप अखण्ड।
रोम रोम प्रति लागहीं कोटि कोटि ब्रह्माण्ड।।
श्री रामलला जब ४ वर्ष के हो गये तो एक बार अपने सखाओं के साथ खेल रहे थे। पिता श्रीदशरथजी महाराज उन्हें भोजन के लिये बुलाते हैं, लेकिन प्रभु नहीं आये। महारानी कौशल्या उनको ला करके महाराज दशरथ की गोंद में बैठा देती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाय तो श्रीदशरथजी ज्ञान के स्वरूप हैं और महारानी कौशल्या भक्ति स्वरूपा हैं।ईश्वर को भक्ति ही गोंद में लाकर बिठा सकती है। इसलिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भगवान की भक्ति ही है। सारे साधन करके साधक को भक्ति प्राप्त करना चाहिए।
अगुन अरूप अलख अज जोई।
भगत प्रेम बस सगुन सो होई।।
प्रभु श्री राम चारों भाइयों का यज्ञोपवीत संस्कार बताया। इसके बाद प्रभु गुरुदेव वशिष्ठ के गुरुकुल में विद्या अध्ययन करने जाते हैं और थोड़े समय में समस्त विद्या प्राप्त कर लेते हैं। भगवान से ही सारी विद्या प्रकट हुई है। विद्या अध्ययन लीला जगत के शिक्षा के लिये है ताकि हर कोई शिक्षा ले सके कि जीवन में ज्ञान अति आवश्यक है। नीति में कहा गया है कि-
आहार निद्रा भय मैथुनं च समानमेतत पशुभिनराणां।
ज्ञानो हि तेषां अधिको विशेष: ज्ञानेन हीन: पशुभि: समान:।।
स्वामी श्री विवेकानंद जी ने कहा कि- मनुष्य दूसरे जीवों से तीन विशेषता अधिक रखता है। १-धर्मे विशेषे,२- कर्मे विशेषे और ३-ज्ञाने विशेषे । मनुष्य दूसरे जीव जन्तुओं से धर्म में बड़ा है, कर्म में बड़ा है और ज्ञान में बड़ा है। जिस मनुष्य के जीवन में न तो कोई धर्म है, न सत्कर्म है और न तो आध्यात्मिक विद्या का ज्ञान है ऐसा व्यक्ति दूसरे जीवों के समान ही है। यह बात नीति में भी कही गयी है-
साहित्य संगीत कला विहीन:। साक्षात् पशु पुच्छ विषाण हीन:।।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।