Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, आश्विनमास पितरों के लिए समर्पित होता है। इसे पितृपक्ष कहते हैं। इस अवसर पर पितृ हमसे आशा रखते हैं कि हमारे वंशज हमको स्मरण करेंगे और हमारे लिए कुछ न कुछ करेंगे। इस अवसर पर किया गया दान-पुण्य,सत्कर्म का फल पितरों को प्राप्त होता है। जिससे पितृ प्रसन्न होते हैं और हम सबको आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
यह पर्व भाद्रमास की पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर आश्विनमास के अमावस्या तक चलता है। जिसमें हम अपने पितरों के प्रति अपना भाव समर्पित करते हैं।श्राद्ध शब्द श्रद्धा शब्द से बना है। पूर्वजों के प्रति,पितृ देवताओं के प्रति, बड़ों के प्रति जो हमारी श्रद्धा है, वही उनके लिए श्राद्ध के रूप में समर्पित होती है। श्रुति कहती है कि-
श्रद्धामयेवं पुरुषः(यजुर्वेद) मनुष्य मांस,अस्थि,रक्त,चर्म,मेंद, मज्जा का नहीं बना है। मनुष्य श्रद्धा का बना है। ईश्वर के प्रति श्रद्धा, संतो के प्रति श्रद्धा, गायों के प्रति श्रद्धा माता-पिता के प्रति श्रद्धा, बड़ों के प्रति श्रद्धा, जिसमें नहीं है वह मानव कहलाने लायक नहीं है। यह जो श्राद्ध का पर्व है, यह अपने पितरों के प्रति हमारी जो श्रद्धा है उसको प्रकट करने का पर्व है।
‘शत धा इति श्रद्धा’ जैसे बरसात के दिनों में पहाड़ से हजारों झरने गिरते हैं वैसे ही जिसमें श्रद्धा आ गई। ज्ञान, भक्ति, सुख, समृद्धि की हजारों धाराएं आती है। हजारों वर्ष की तपस्या करने वाले रह जाते हैं माता-पिता,गुरुजन,संतों में श्रद्धा रखने वाले ईश्वर को पा लेते हैं। आद्यगुरु भगवान् श्रीशंकराचार्य जी की मां बाहर जा रही थी। बालक शंकर से कहा- मां को दूध पिला करके पीना।
बालक शंकर की श्रद्धा से ही भगवती ने दूध पिया। बिना श्रद्धा के न तो श्राद्ध है, न मां-बाप, श्रद्धा के बिना न मंदिर, श्रद्धा के बिना न कथा, श्रद्धा के बिना कुछ भी नहीं है। सब बेकार है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।