Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, श्राद्ध भी कई प्रकार का होता है। जिस तिथि पर व्यक्ति की मृत्यु होती है, वह मुख्य तिथि वर्ष में जब एक बार आती है, उस तिथि को उसके लिए जो श्राद्ध किया जाता है, उसको एकोदिष्ट श्राद्ध कहते हैं। वह केवल एक व्यक्ति के लिए होता है। जिसकी मृत्यु उस तिथि में हुई है। उसी के लिए होता है, उसको एकोदिष्ट श्राद्ध कहते हैं।
पितृपक्ष में श्राद्ध होता है, उसको पार्वण श्राद्ध कहते हैं। क्योंकि ये पितरों का पर्व है।सोलह दिनों तक पितरों का उत्सव होता है। पितरों के पर्व पर जो श्राद्ध किया जाता है। इसलिए इसको पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। पार्वण श्राद्ध में किसी एक पितर का पिण्डदान नहीं होता।
जितने पितृ आपके कुल में हैं, जो-जो आपको याद हैं, जिससे आपका स्नेह है, सम्बन्ध हैं चाहे वो आपके परिवार के नहीं दूसरे परिवार के हों। लेकिन आप उनके प्रति स्नेह रखते हैं, उनको पिण्डदान देना चाहते हैं।पार्वण श्राद्ध के अवसर पर उनको भी पिण्डदान दिया जाता है।
उसमें भी क्रम होता है। पहले पिता को, फिर पितामह को, फिर पितामह के पिता को, फिर माँ को, फिर दादी को, फिर परदादी को। फिर नाना जी को, फिर परनाना को, फिर उनके पिताजी को। फिर नानी को, फिर परनानी को, फिर उनकी सासू माँ को। फिर अपने चाचा, मामा, मौसी, भाई की पत्नी, पुत्र जो भी संसार से चला जा चुका है, जो आपका अपना था, जिसके प्रति आपका स्नेह है- गुरु, मित्र, सेवक, नौकर कोई भी हो श्राद्ध ही ऐसा कर्म है जो कोई भी व्यक्ति किसी के लिए कर सकता है।
केवल अपने पितरों के लिए ही नहीं किया जाता। आपकी अगर श्रद्धा है कि- अमुक व्यक्ति के घर में कोई नहीं- उसके पुत्र-पुत्री नहीं है, कौन उसका पिण्डदान करेगा। आपकी अगर उसके प्रति श्रद्धा है।आप पिण्डदान करें, उनको पिण्डदान प्राप्त होगा, उसको भी उत्तम गति की प्राप्ति होगी। रामायण में लिखा है कि- गीधराज जटायु की अन्तिम क्रिया, तर्पण, पिण्डदान,श्राद्ध सब भगवान राम ने किया।
गीधराज जटायु पक्षी हैं, भगवान नर नीला कर रहे हैं। कहाँ मनुष्य, कहाँ पक्षी एक प्रेम, एक सम्बन्ध के कारण भगवान राम ने गीधराज जटायु के लिए पिण्डदान किया। गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज ने लिखा है-
तेहिं कर क्रिया ज्थोचित निजकर किन्ही राम।।
पितृपक्ष में सभी को पिण्ड दिया जाता है। इसके बाद कहीं भी तीर्थ में आप जाते हैं, व्यवस्था हो पावे तो अपने पितरों के लिए पिण्डदान अवश्य करें। तीर्थ के श्राद्ध में अपने समस्त प्रियजनों को पिण्डदान दिया जाता है। घर में कोई उत्सव हो, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत हो, कोई भी अनुष्ठान हो तो, उस अवसर पर पितरों के लिए जो श्राद्ध किया जाता है, उसे नांदी मुख श्राद्ध कहते हैं।
नांदी का मतलब आनन्द, आनन्द की बेला में जो पितरों का पूजन करते हैं। उसे नांदीमुख श्राद्ध कहते हैं, ्रीमद्भागवत महापुराण में लिखा है कि- भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य पर नंद बाबा ने नांदीमुख श्राद्ध किया और भगवान श्री राम के प्राकट्य पर श्री दशरथ जी महाराज ने जातकर्म संस्कार के अवसर पर नांदीमुख श्राद्ध किया। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।