Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, संसार का यही स्वरूप है। यहां की प्रत्येक वस्तु क्षणभंगुर है। इसमें ममता आसक्ति होने से बन्धन तथा दुःख होता है। आत्मा के नाते एक परम तत्व होने पर भी जीव के नाते कोई किसी का नहीं है। न किसी के साथ किसी का स्थाई सम्बन्ध है। जैसे रेल के डिब्बे में या धर्मशाला में, जहां-तहां के यात्री आकर इकट्ठा हो जाते हैं और फिर समय पर अपनी-अपनी राह चल देते हैं, यही यहां का हाल है।
इलाज करना करवाना कर्तव्य है, सो करवाया ही जाता है, पर इलाज करने वाले भी मृत्यु से नहीं बच सकते। संसार के इस दुःखमय स्वरूप को समझकर जीवन के असली उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए। महापुरुषों के प्रति परम श्रद्धा अर्जन कीजिये। महापुरुषों की महिमा का वर्णन नहीं हो सकता।
महापुरुष जिस कुल में उत्पन्न होते हैं, उस कुल के सभी व्यक्ति परमात्मा की प्राप्ति के अधिकारी बन जाते हैं।महापुरुष जहां रहते हैं, जहां उनके चरण टिक जाते हैं, वह स्थान पवित्र हो जाता है तथा विशेष प्रभावशाली बन जाता है। बिना झाड़े बुहारे भी वह स्थान पवित्र है। उस स्थान पर बैठकर भगवान का ध्यान करने से स्वत: ध्यान लग जाता है। महापुरुषों की सन्निधि का यदि सौभाग्य मिल जाय तो फिर क्या कहना है। महापुरुषों की सन्निधि में बैठकर ध्यान करने से ऐसा प्रगाढ़ ध्यान होगा कि मानों भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन हो रहे हो।
संसार में जितने भी तीर्थ हैं, सब महात्माओं के कारण या उनकी कृपा से ही हैं। वृंदावन, अयोध्या आदि भगवान के अवतार स्थल होने से तीर्थ हैं, किन्तु इसमें हेतु तो भक्त-महापुरुष ही हैं। भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार में वसुदेव-देवकी हेतु बने और भगवान् श्रीराम के अवतार में दशरथ-कौशल्या, वस्तुतः अवतार प्रधानत: भक्तों महापुरुषों के लिये ही होते हैं। इन अवतार स्थलों के अतिरिक्त जो तीर्थ हैं वे महापुरुषों के निवास स्थल होने से ही तीर्थ बन जाते हैं।
परमार्थ-साधन में श्रद्धा बहुत ही महत्व की वस्तु है। ईश्वर में, महात्मा में, शास्त्र में जो पूज्य भाव है – प्रत्यक्ष की भांति विश्वास है- उसका नाम श्रद्धा है और प्रत्यक्ष से भी बढ़कर विश्वास का नाम परम श्रद्धा है। महापुरुषों के प्रति ऐसी ही परम श्रद्धा अर्जन करने का प्रयत्न करना चाहिए। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।